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सोमवार, अगस्त 11, 2008

शहरयार गुलज़ार : शहरनामे

शहरयार : गुलज़ार
नया ज्ञानोदय, जून २००८


भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय के पिछले अंक (जून २००८) में गुलज़ार साब की कलम ने पांच शहरों की तस्वीरें उकेरी हैं, कविताओं के माध्यम से शहरों के चरित्र को पेश किया है..

प्रस्तुत हैं शहरनामे के कुछ अंश..
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बम्बई



बड़ी लम्बी सी मछली की तरह लेटी हुई पानी में ये नगरी
कि सर पानी में और पांव जमीं पर हैं
समन्दर छोड़ती है , ना समन्दर में उतरती है
ये नगरी बम्बई की..



....


यहां जीना भी जादू है
यहां पर ख्वाब भी टांगों पे चलते हैं
उमंगें फूटती हैं, जिस तरह पानी मे रक्खे मूंग के दाने
चटखते हैं तो जीभें उगने लगती हैं

यहां दिल खर्च हो जाते हैं अक्सर कुछ नहीं बचता

.....


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मद्रास (चेन्नई)



शहर ये बुजुर्ग लगता है
फ़ैलने लगा है अब
जैसे बूढ़े लोगों का पेट बढ़ने लगता है

ज़बां के ज़ायके वही
लिबास के सलीके भी....

.....

ख़ुशकी बढ़ गयी है जिस्म पर, ’कावेरी’ सूखी रहती है

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कोलकता


कभी देखा है बिल्डिंग में,
किसी सीढ़ी के नीचे
जहां मीटर लगे रहते हैं बिजली के
पुराने जंग आलूदा...
खुले ढक्कन के नीचे पान खाये मैले दांतों की तरह
कुछ फ़्यूज़ रक्खे हैं
...
बेहया बदमाश लड़के की तरह वो
खिलखिला के हंसता रहता है!

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दिल्ली - पुरानी दिल्ली की दोपहर


लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
चारपाई बुनने वाला जब
घंटा घर वाले नुक्कड़ से, कान पे हाथ रख कर
इक हांक लगता था - ’चार पाई. बनवा लो...’
खसखस कि टट्यों में सोये लोग अन्दाज़ा लगा लेते थे.. डेढ़ बजा है..
दो बजते बजते जामुन वाला गुजरेगा

’जामुन.. ठन्डे.. काले जामुन’


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न्यूयार्क

तुम्हारे शहर में ए दोस्त
क्यूं कर च्युंटियों के घर नहीं हैं
कहीं भी चीटियां नहीं देखी मैने

अगरचे फ़र्श पे चीनी भी डाली
पर कोइ चीटीं नज़र नहीं आयी
हमारे गांव के घर में तो आटा डालते हैं, गर
कोइ क़तार उनकी नज़र आये

....


तुम्हारे शहर में गरचे..
बहुत सब्ज़ा है, कितने खूबसूरत पेड़ हैं
पौधे हैं, फूलों से भरे हैं

कोई भंवरा मगर देखा नहीं भंवराये उन पर

......


मेरा गांव बहुत पिछड़ा हुआ है
मेरे आंगन के बरगद पर
सुबह कितनी तरह के पंछी आते हैं
वे नालायक, वहीं खाते हैं दाना
और वहीं पर बीट करते हैं


तुम्हारे शहर में लेकिन
हर इक बिल्डिंग, इमारत खूबसूरत है, बुलन्द है
बहुत ही खूबसूरत लोग मिलते हैं

मगर ए दोस्त जाने क्यों..
सभी तन्हा से लगते हैं
तुम्हारे शहर में कुछ रोज़ रह लूं
तो बड़ा सुनसान लगता है..
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शहरयार : गुलज़ार
नया ज्ञानोदय, जून २००८
(भारतीय ज्ञानपीठ)
jnanpith.net

रविवार, अक्टूबर 07, 2007

नो स्मोकिंग : फिर तलब, है तलब [No Smoking : Music Review]

[वैधानिक चेतावनी : नो स्मोकिंग का संगीत स्वास्थ्य के लिये हानिकारक साबित हो सकता है.. बार बार की रिवाईंडिंग आपकी उंगलियों को नुकसान पहुंचा सकती है.. और संगीत का हर कश आपको इस एल्बम का तलबगार बना सकता है ]


बीड़ी की आग अभी तक बुझी नहीं थी, कि गुलज़ार साब विशाल के साथ सिगरेट लेकर हाज़िर हो गये हैं... नो स्मोकिंग का संगीत आ गया है.. हालांकि हर गीत सिगरेट विरोधी स्वर लिये हुए है मगर यकीन मानिये इसके संगीत के एक एक कश में बहुत नशा है.. एक बार सुनने के बाद फिर से सुनने कि तलब लगती है.. बहुत अल्हदा किस्म की फ़िल्म लग रही है नो-स्मोकिंग और संगीत ने भी इस धारणा को और मजबूत बना दिया है... एल्बम के सारे गीत फ़िल्म की नायिका (सिगरेट.. शायद खलनायिका भी कह सकते हैं) और नायक जौन के उसके मोहपाश में बंधे होने की दास्तां को बयां करते हैं...
सिगरेट की खौफ़नाक़ खूबसूरती के मंज़र बहुत खूबी से इस एलबम के गीतों में उकेरे गये हैं
गुलज़ार साब ने अपने गीतों मे सिगरेट पीने वालों की ज़िन्दगी के एक्स-रे, सर्जरी और पोस्ट-मार्टम कविताई अन्दाज़ में पेश किये हैं..


एल्बम का पहला गीत अदनान सामी ने गाया है और क्या खूब गाया है.. सिगरेट की सुलगन और ज़िन्दगी की क़तरा कतरा पिघलन को, उलझन को डूब के गाया है

फिर तलब, है तलब...
बेसबब, है तलब
शाम होने लगी है, लाल होने लगी है

जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूं
आग पे पाँव पड़ता है, कमबख़्त धुएं में चलता हूं

"फिर किसी ने जलाई, एक दिया सलाई
आसमां जल उठा है, शाम ने राख उड़ायी"

नायक के अन्दर की धीमी धीमी सुलगन, और धीरे धीरे ही राख में तब्दीली को गुलज़ार अपने ही अन्द्दज़ में बहुत खूबी से कह जाते हैं

"उपले जैसे जलता हूं, कम्बख्त धुएं में चलता हूं"

और विजुअल कन्स्ट्रक्शन देखिये
"लम्बे धागे धुएं के सांस सिलने लगे हैं
प्यास उधड़ी हुई है, होठ छिलने लगे हैं
शाम होने लगी है, लाल होने लगी है" (ज़िन्दगी की शाम, खून की लाली?)

गीत सुनने के बाद ये अन्दाज़ा लगाना नामुमकिन हो जाता है कि गीत का सबसे मजबूत पक्ष अदनान की गायकी में है, विशाल की शानदार कम्पोजिशन में या गुलज़ार साब के शब्दों मे.. तीनों का मेल एल्बम को बेहतरीन शुरुआत देता है. गीत बाद मे सुनिधि की अवाज़ में भी है, और वो गीत भी बहुत खूबसूरत बन पड़ा है.. मगर अदनान के सामने थोड़ा फीका सा लगता है..

अगला गीत "फूंक दे" भी दो बार है, रेखा भारद्वाज और सुखविन्दर सिंह के स्वरों में.. यकीन मानिये दोनो वर्शन दो अलग अलग गीतों सा मज़ा देते हैं.. रेखा का वर्शन रस्टिक फ्लेवर में है.. और गुलज़ार साब के बोल सिगरेट के ज़हर के अपने ही तरीके से बयां करते हैं

"हयात (ज़िन्दगी) फूंक दे, हवास (रूह) फूंक दे
सांस से सिला हुआ लिबास (शरीर) फूंक दे.. "

"पीले पीले से जंगल में बहता धुआं
घूंट घूंट जल रहा हूं, पी रहा हूं पत्तियां" (तम्बाक़ू की)


कश लगा एल्बम का अगला गीत है.. सुखविन्दर, दलेर मेहंदी और स्वयं विशाल भारद्वाज की आवाज़ में कव्वालीनुमा गीत है... तीनों गायकों का तालमेल अच्छा बन पड़ा है.. गीत अल्बम को मोनोटोनस होने से बचाता भी है, फिर भी एल्बम क सबसे कमजोर गीत है

"ये जहान फ़ानी है...बुलबुला है, पानी है
बुलबुलों पे रुकना क्या, पानियों पे बहता जा"


इसके बाद बारी आती है एल्बम के सबसे खूबसूरत लिखे गये गीत ’एश-ट्रे’ की.. विशाल की कम्पोसिशन गीत के मूड के मुताबिक है और और नये गायक देवा सेन गुप्ता इस मुश्किल से गीत को सफलता से निभा गये हैं...

"बहुत से आधे बुझे हुए दिन पड़े हैं इसमे
बहुत से आधे जले हुई रात गिर पड़ी हैं
ये एश-ट्रे भरती जा रही है"

बहुत खूब!


फिर तलब... है तलब...
इस तलब के लिये बहुत बहुत शुक्रिया..
विशाल को, गुलज़ार साब को, और अनुराग कश्यप को, जिन्होने बिकाऊ संगीत के बजाय ऐसा संगीत चुनने में हिम्मत और ईमानदारी दिखायी जो स्क्रिप्ट के अनुरूप है..


और मैं फिर से री-वाईण्ड कर रहा हूं...

मंगलवार, अक्टूबर 02, 2007

सचिन देव बर्मन स्मृति [मेरे पिताजी का बोया पौधा गुलज़ार ] Pancham Remembers

आज सचिन देव बर्मन जी का १०१वां जन्मदिवस है. गुलज़ार साब ने सचिन दा के साथ ही गीतकार के रूप में शुरुआत की थी... प्रस्तुत है इस अवसर पर पंचम का 80 के दशक का लिखा एक आलेख "मेरे पिताजी का बोया पौधा - गुलज़ार"



मेरे पिताजी का बोया पौधा - गुलज़ार

आज से लगभग बीस साल पहले की बात है. एक दिन मेरे पिताजी (स्व सचिन देव बर्मन) मुझे अपने साथ 'मोहन स्टुडिओ' ले गये, जहां बिमल-दा की फ़िल्म सुजाता की 'सिटिन्ग' थी. मैं वहां के लोगों के लिये बिल्कुल नया था,
इसलिये पिताजी ने मुझे बिमल-दा की यूनिट के सभी लोगों से मिलाया. उन्हीं में से एक थे बिमल-दा के असिस्टेन्ट - गुलज़ार

उनके नाम से मैने समझा कि शायद वे किसी मौलवी के रिश्तेदार होंगे, लेकिन जब उनका असली नाम पढा, तब मैने जाना कि वास्तव में वो सिख हैं पर बाल कटवा दिये हैं.

तब से ही हम लोगों की जान पहचान हो गयी.

उन दिनो मैं पिताजी का असिस्टेन्ट हुआ करता था. मेरे कोइ खास दोस्त नहीं थे, इसलिये गानों की सिटिन्ग खत्म होने पर मैं सीधा गुलज़ार के पास चला जाता था. उन दिनों वे जुहू में रघुनाथ झालानी वगैरह के साथ रहते थे.
वहीं जाकर मैं उन सबके साथ बैठता था. वहां हम दोनो की बात-चीत सिर्फ़ फ़िल्मों पर ही हुआ करती थी. अच्छी बात ये थी कि हम लोग सिर्फ़ काम की बातें किया करते थे, फ़ालतु बात तो शायद कभी की ही नहीं. उन बैठकों में
मुझे फ़िल्म कला के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला.

फिर आयी फ़िल्म 'बन्दिनी'. गुलज़ार ने इसमे मेरे पिताजी के संगीत निर्देशन में एक बडा खूबसूरत गीत लिखा 'मोरा गोरा अंग लई ले'. लेकिन चुंकि उस वक्त पिताजी के साथ पहले से ही कुछ दूसरे गीतकारों की टीम बन चुकी थी, इसलिये गुलज़ार को उनके साथ काम करने का उतना मौका न मिल सका, जितना की उन्हें वास्तव में मिलना चाहिये था

तभी से मेरे मन में यह बात घर कर गयी थी कि अगर कभी मैं संगीत निर्देशक बना, तो इनके साथ ज़रूर काम करूंगा.

बाद में मैं संगीत-निर्देशक बन गया, और फिर आयी फ़िल्म 'परिचय', जिसमे हम दोनो पहली बार एक-दूसरे से गीतकार-संगीतकार के रूप में मिले

एक दिन की बात है. मैं किसी फ़िल्म की 'बैक-ग्राउन्ड म्युजिक' के सिल-सिले में 'राज-कमल स्टुडिओ' गया हुआ था. वहां गुलज़ार भी थे.. उन्होने मुझ-से कहा...
"पन्चम! एक गीत का मुखडा है, देखो कैसा लगता है!"

मैने कहा "लिखवा दें"

उन्होने वह मुखडा मुझे लिखवाया. जादू था उन शब्दों में ! मैं बिल्कुल चमत्क्रत सा रह गया था उसे सुन-कर! मेरे मन में उसी वक्त यह इच्छा हुई की यह कह दूं कि एक संगीतकार को जितने अच्छे बोल, 'मूड' और 'एक्सप्रेशन्स' मिलते हैं, वह उन्हें उतनी ही अच्छी तरह से स्वर-बद्ध करने की कोशिश करता है. लेकिन मैं कुछ बोला नही.

वह कहने लगे, "अच्छा! मैं चलता हूं."

इस पर मैने कहा, "नहीं! ज़रा दो मिनट ठहरिये"

तब उन्होने देखा की मैं किस तरह गाने कम्पोस करता हूं. लगभग पांच मिनट तक सोचने के बाद मैने उस मुखडे को सुर में ढालने की कोशिश की. लेकिन कोइ खास बनती नज़र नहीं आयी.

तब उन्होने कहा, "चलता हूं, परसों मिलेंगे"

मैं रास्ते भर उसी मुखडे के बारे में सोचता हुआ, उसे तरह तरह के सुरों में गुन-गुनाता हुआ घर लौटा. और उसी रात अपनी फ़िल्म की 'बैक-ग्राउन्ड म्युजिक' खत्म करने के बाद मैं तुरन्त गुलज़ार के घर गया. जब वे बाहर आये,
मैं उन्हें सीधे अपनी कार के अन्दर ले आया. कार में एक 'टेप-रेकोर्डर' लगा हुआ था. उस्में मैने वही मुखडा - जो उन्होने सुबह लिखवाया था - अपनी आवाज़ में थोडी बहुत म्युजिक के साथ रेकार्ड कर लिया था.

मैने टेप चला दिया. गीत बजने लगा

मुसाफ़िर हूं यारों
ना घर है, न ठिकाना
मुझे चलते जाना है
बस चलते जाना

उसे सुनकर वे बहुत खुश हो गये और बोले "पन्चम! गाना बहुत खूबसूरत बना है. इसे परसों तक रेकार्ड करना है."

मैने सोचा कि चलो मेरी मेहनत सफल हुई. लेकिन साथ ही एक परेशानी भी आ खडी हुई. ईश्वर की दया से उन दिनों मैं काफ़ी 'बिज़ी' संगीतकार हो गया था. उसी बीच बहुत सारे काम भी निपटाने थे. इसलिये मैं सोचने लगा कि परसों तक कैसे रिकार्ड करूंगा ? वक्त ही नहीं है. बडी मुश्किल होगी.

अपनी परेशानी ज़ाहिर करने के लिये मैं एक मिनट चुप रहने के बाद उनसे बोला,
"गुलज़ार! तूने मुखडा तो बहुत अच्छा दिया, लेकिन अंतरा बहुत बकवास कर दिया."

यह सुनते ही वे हंस पडे.

उस दिन से हम दोनो काम की दोस्ती में बंध गये. अब हम जब कभी काम के लिये बैठते हैं, तो काम सोचकर नहीं करते हैं. बल्कि उसे 'एन्जाय' करते हैं. अब हम दोनो की आपस में ऐसी 'ट्यूनिंग' हो गयी है के हमेशा यही होता है कि कभी-कभी पहले वे कुछ बोल लिख देते हैं, और उनके 'एक्सप्रैशन्स' को समझ कर उसी के हिसाब से मैं धुन बनाता हूं; और कभी कभी मैं पहले धुन बनाता हूं और उसके 'एक्सप्रैशन्स' के अनुसार वे बोल लिख देते हैं.

लेकिन बात हमेशा बढिया बनती है!

वे कभी भी 'सिटिंग' के लिये कोइ टाइम वगैरह 'फ़िक्स' करके नहीं आते हैं. अपना घर जानकर, अधिकार के साथ, जब जी चाहे चले आते हैं. ऐसे समय में मैं उनसे कहता हूं, "मुझसे काम करवाने आये हो?"

जवाब में वे मुस्कराकर कहते हैं, "पागल हो गये हो ?, मैं तुमसे नहीं, गोरखे से काम लेने आया हूं."

मुझे अकसर वे प्यार से 'गोरखा' कह कर भी पुकारते हैं.

अब तो हम दोनो की एक टीम बन गयी है. अब उन्हैं मेरे संगीत-निर्देशन में फ़िल्म 'गोलमाल' के लिये लिखे गये गीत - 'आने वाला पल जाने वाला है...' - पर 'फ़िल्मफेयर पुरस्कार' मिला तो उस वक्त मुझे लगा कि आज मेरे स्वर्गीय पिताजी का बोया पौधा कितना विशाल हो गया है! जो काम उनसे अधूरा छूट गया था, शायद वह मेरे हाथों पूरा हो रहा है - यह सोचकर खुशी से मेरी आंखें भर आयी थी.

हालांकि, हम दोनों ने बहुत सारी फ़िल्मों में साथ-साथ काम किया है, लेकिन एक बात आज तक मेरी समझ में नहीं आयी है. जब कभी मैं अपने दोस्तों को अपने 'रिकार्ड' किये हुए कुछ ताजे गीत सुनाता हूं, और उनमें से अगर एक भी गीत गुलज़ार का होता है, तो ना जाने कैसे वे लोग तुरंत 'पिन-प्वाइन्ट' कर देते हैं कि यह गीत 'गुलज़ार-टाइप' का है, ज़रूर गुलज़ार का लिखा होगा!

यह 'गुलज़ार-टाइप' क्या है? इसका क्या राज़ है? सच पूछिये तो यह बात मुझे भी नहीं मालूम. जब दोस्तों से पूछता हूं कि आखिर ये 'टाइप' क्या है, तो वे कहते हैं कि ये तो सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, बयान नहीं किया जा सकता.

शायद ये चमत्कार गुलज़ार के शब्दों क है! उनके अनोखे 'एक्सप्रैशन्स' का है!

अन्त में , एक बात अपनी तरफ़ से और लिखना चाहूंगा, हालांकि, गुलज़ार बहुत पढे-लिखे, समझदार और काबिल गीतकार हैं - लेकिन उनका स्वभाव बिल्कुल बच्चों जैसा है.

राहुल देव बर्मन

शुक्रवार, सितंबर 28, 2007

मीरा : विचार से पर्दे तक का सफ़र [ Gulzar on the making of Meera ]

मीरा : विचार से पर्दे तक का सफ़र
गुलज़ार

(फ़िल्म पूरी होने से पूर्व १५ दिसम्बर १९७५ को लिखा आलेख, राधाकृष्ण पर प्रकाशित 'मीरा' से साभार)

प्रेम जी आये एक रोज़ । सन १९७५ की बात है । साथ में बहल साहब थे - श्री ए.के. बहल । प्रेमजी ने बताया कि वह 'मीरा' बनाना चाहते हैं ।

बस, सुन के ही भर गया ! यह ख़याल कभी क्यों नहीं आया?
उस 'प्रेम दीवानी' का ख़याल शायद सिर्फ़ प्रेम जी को ही आ सकता था ।

बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रेम जी को 'दीवान-ए-ग़ालिब' ज़ुबानी याद है । ऐसी याददाश्त भी किसी दूसरे की नहीं देखी । उर्दू अदब के सिर्फ़ शौक़ीन नहीं, दीवाने हैं; और अन्ग्रेज़ी में कल तक आख़िरी किताब कौन-सी छपी है,
बता देंगे, और यह भी कि:
'मार्केट में अभी आयी नहीं । उसका 'थीम' कुछ ऐसा है...।'

किताबें ज़ुबानी याद रखने की उन्हें आदत-सी हो गयी है । ऐसे प्रोड्यूसर के साथ काम करना वैसे ही ख़ुशक़िस्मती की बात है, और फिर 'मीरा' जैसी फ़िल्म पर!

अगस्त १९७५ में 'मीरा' बनाने का फ़ैसला तय पा गया । १४ अक्तूबर सन १९७५ को 'मीरा' के मुहूर्त का दिन निकला । दिन दशहरे का था ।

यह ख़याल भी प्रेम जी का ही था कि मुहूर्त लताजी से करवाया जाये । आज की 'मीरा' तो वही हैं!

प्रेम जी ख़ुद बडे शर्मीले क़िस्म के इंसान हैं । बडे से बडा काम करके भी खुद पर्दे के पीछे रहते हैं । यह ज़िम्मेदारी उन्होने मुझे सौंप दी।

लता जी मुहूर्त के लिये तो राज़ी हो गयीं, लेकिन उन्होने फ़ौरन हमारे कान में यह बात भी डाल दी कि वह इस फ़िल्म के लिये गा नहीं सकेंगी। मौक़ा और वक़्त ऐसा था कि बहस करना मुनासिब न समझा, सो मुहूर्त हो गया, लेकिन लगा कि कहीं एक सुर कम रह गया है!

भूषण जी दिल्ली से मीरा पर किताबों का सूटकेस भरकर ला चुके थे, और उन्हें पढना, उलटना-पलटना शुरू कर चुके थे। किताबें बेहिसाब थीं, और मीरा कहीं भी नहीं! यह राम-कहानी आप भूषण जी की ज़ुबानी ही सुनियेगा । भूषणजी की याददाश्त भी कमाल की है; उन्हें जिल्द समेत किताब चट कर जाने की आदत है। और कहीं इतिहास की चर्चा छिड जाये तो बता देंगे - मोहन-जो-दडो में चीटियों के बिल कहां कहां पर थे!

इतनी सारी उलझा देने वाली बातों में से , ज़ाहिर है, कोई एक रास्ता अपनाना ज़रूरी था । छोटी-मोटी समझ-बूझ के अनुसार जो चुना वही आप फ़िल्म में देखेंगे । लेकिन इस फ़िल्म की आप-बीती भी मीरा के संघर्ष से किसी तरह कम नहीं ।

सन १९७६ में स्क्रिप्ट तैयार हुई और जून १९७६ से शूटिंग शुरू होनी थी । उम्मीद थी, आठ-दस माह में फ़िल्म की शूटिंग पूरी हो जायेगी ।

'मीरा' के 'पति' की तलाश में उतनी ही दिक्कत हुई जितनी कि हेमा को अपनी ज़िन्दगी में... या कहिये, हेमा की मम्मी को बेटी का वर ढूंढने में हुई हो, या हो रही हो! कोई हीरो यह रोल करने को तैयार नहीं था । किस-किस की
ड्योढी पर शगुन की थाली गयी, कहना मुश्किल है । ख़ुद कृष्ण होते तो शायद... । आख़िरकार अमिताभ मान गये ।

१९ जून १९७६ को शूटिंग का पहला दिन था । इसीलिए मई में 'मेरे तो गिरधर गोपाल' की रिकार्डिंग रखी गयी थी । सबसे पहले इसी गाने को फ़िल्माना था । लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को हम लता जी की मर्ज़ी बता चुके थे; उन्हें फिर भी यक़ीन था कि वे लता जी को मना लेंगे। रिकार्डिंग से कुछ दिन पहले लक्ष्मीजी ने लताजी से बात की । और उन्होने फिर इंकार कर दिया । लक्ष्मीजी दुविधा में पड गये । मुझसे कहा कि आप ख़ुद एक बार और लताजी से कहकर देखिये । मैंने फिर बात की लताजी से । उनके ना गाने की वजह मुझे बहुत माक़ूल लगी । उन्होने बताया कि मीरा के दो प्राइवेट एल.पी. वह गा चुकी हैं और जिस श्रद्धा के साथ उन्होने मीरा के भजन गाये, उसके बाद अब वह किसी भी 'कमर्शियल' नज़रिये से मीरा के भजन नहीं गाना चहतीं। मैंने उनका फ़ैसला लक्ष्मी-प्यारे तक पहुंचा दिया, और दरख्वास्त की कि वह किसी और आवाज़ को चुन लें।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फ़िल्म छोड दी। इस फ़िल्म में म्युज़िक देने से इंकार कर दिया।

हमारे पास कोई रास्ता नहीं था। फ़िल्म का सेट लग चुका था । प्रेमजी बहुत परेशान थे, लेकिन उनके हौसले का जवाब नहीं; बोले:
'मीरा सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं है.. एक मक़सद भी है.. बनायेंगे ज़रूर!'

गीतों को फ़िलहाल छोडकर हमने १९ जून १९७६ से फ़िल्म की शूटिंग शुरू कर दी । फ़िल्म में विद्या सिन्हा का प्रवेश अचानक हुआ । उस छोटे से रोल के लिये उसका राज़ी हो जाना मुझ पर एक निजी एहसान था । शायद दूसरी कोई हीरोइन उसके लिये तैयार न होती । पहली शूटिंग हमने हेमा और विद्या के साथ की, और गौरी के साथ - जिसने ललिता का रोल किया है ।

दो दिन में यह सेट ख़त्म हो गया।

एक बार फ़िर 'वर' की तलाश शुरू हुई । 'मीरा' के लिये म्युज़िक डायरेक्टर भी चाहिये था । 'पंचम', यानी आर.डी. बर्मन, मेरे दोस्त हैं । उनसे पूछा, वह भी तैयार न हुए। लता जी से ना गवा कर वह किसी वाद-विवाद या कंट्रोवर्सी में नहीं पडना चाहते थे।

इस नुक़्ते को लेकर किसी तरह के वाद-विवाद की बात मेरी समझ में भी नहीं आती थी । अब सभी तो दिलीप कुमार को लेकर फ़िल्में तो नहीं बनाते! और अगर दिलीप साब किसी फ़िल्म में काम ना करें तो... क्या प्रोड्यूसर फ़िल्में बनाना छोड दें, या डायरेक्टर डायरेक्शन से हाथ खींच ले? मुझे लगा - उन सब के 'कैरियर' सिर्फ़ एक आवाज़ के मोहताज हैं । उस आवाज़ के सहारे के बग़ैर कोई एक क़दम भी नहीं चल सकता । बहरहाल यह मसला म्युज़िक डायरेक्टर का था । कुछ हफ़्ते तो ऐसी परेशानी में गुज़रे कि लगता था, यह फ़िल्म ही ठप हो जायेगी । तभी फ़िल्म के आर्ट डायरेक्टर देश मुखर्जी ने एक दिन एक नाम सुझाया । और वह नाम फ़ौरन दिल-दिमाग़ में जड पकड गया - पंडित रविशंकर !

पंडितजी बहुत दिनों से अमरीका में रहते थे । हिन्दुस्तानी फ़िल्मों में म्युज़िक देना तो वह कब का छोड चुके थे!
पता-ठिकाना मालूम करना भी दूर की बात लगी, और फिर अगर वो मान भी जायें तो इतने गाने कब और कैसे रिकार्ड होंगे ? हर गाने कि रिकार्डिंग के लिये तो उन्हें अमरीका से बुलवाया नहीं जा सकता । फिर भी, एक चिराग़ जला तो सही... चाहे बहुत दूर ही सही ।

पांच-सात दिन की कोशिशों के बाद हम दोनों के दोस्त हितेन चौधरी ने पंडितजी का फ़ोन नम्बर लाकर दिया, और बतलाया कि फ़लां तारीख़ को वह तीन दिन के लिये इस नम्बर पे लंदन आकर ठहरेंगे । चाहें तो उनसे बात कर लीजिये । चौधरी साहब से हमने अनुरोध किया 'आप परिचय करवा दीजिये, हम बात कर लेंगे' ।

पंडित जी लंदन में थे । मैंने बात की ।

आवाज़ अगर शख्सियत से ढंके पर्दों को खोल कर कोई भेद बता सकती है, तो मैं कह सकता हूं - बातचीत के इस पहले मौक़े पर्ही मुझे उम्मीद हो गयी थी कि पंडित जी मान जायेंगे । इतनी बडी हस्ती होते हुए भी उनकी आवाज़ में बला की नम्रता थी । उनकी शर्त बहुत सादा और साफ़ थी - ' मुझे फ़िल्म की स्क्रिप्ट सुना दीजिये । अच्छी लगी तो ज़रूर संगीत दूंगा'

अगले दिन ही पंडित जी न्यूयार्क जा रहे थे । प्रेमजी ने फ़ौरन फ़ैसला कर लिया : 'आप न्यूयार्क जाइये और हितेन दा को साथ ले जाइये । आप जो मुनासिब समझें, वह फ़ैसला कर आइये ।'

हितेन-दा पुराने दोस्त हैं, मान गये । ३१ जुलाई १९७६ को मैं न्यूयार्क में था । लेकिन पंडित जी न्यूयार्क में नहीं थे।

३ अगस्त को पंडित जी न्यूयार्क लौट आये । उसी शाम उनसे मुलाक़ात हुई । मुलाक़ात के आधे घंटे बाद ही मैंने स्क्रिप्ट सुनानी शुरू कर दी । पूरे दो घंटे चालीस मिनट लगे मुझे स्क्रिप्ट सुनाने में । उसके तीन मिनट बाद ही
'मीरा' को म्युज़िक डायरेक्टर मिल गया !

बाकी सारी बातें हितेन-दा ने तय करा दीं ।

लताजी से जो बात हुई थी मैंने पंडित जी को बतला दी । उन्हें भी अफ़सोस ज़रूर हुआ कि लता जी गातीं तो अच्छा होता ।

लता जी उन दिनों वाशिंगटन में थीं । दो दिन बाद मेरा वाशिंगटन जाना हुआ तो मैंने लताजी से बात की और यह बता दिया कि पंडितजी 'मीरा' के लिये संगीत दे रहे हैं

वहीं - 'वाटरगेट होटल' में मुकेश जी से ज़िन्दगी की आख़िरी मुलाक़ात हुई । शायद नसीब में ऐसा होना लिखा था । रविशंकर जी के चुनाव पर उन्होने मुझे मुबारकबाद भी दी थी । वहीं, उसी दौरे में मुकेशजी का देहांत हो गया।

न्यूयार्क में एक दिन निहायत ख़ूबसूरत आवाज़ का फ़ोन आया :
'मैं फ़िल्मों में काम करना चाहती हूं, लेकिन आप किसी को बताइयेगा नहीं !'
'अरे' मैंने हैरत से कहा, 'आप फ़िल्मों में काम करेंगी तो छुपायेंगी कैसे?"
'छुपाने को थोडे ही कहती हूं, आप बताइयेगा नहीं ! लोग अपने आप देख लेंगे!'

वह दीप्ती थी - दीप्ती नवल ! किसी न किसी रोज़, एक ना एक फ़िल्म में आप उसे ज़रूर देखेंगे !

सोलह अगस्त तक मैं पंडित जी के साथ था । उनके बेहद व्यस्त प्रोग्राम में, जहां जहां वक़्त मिला, वह मीरा के भजनों पर काम करते रहे, स्क्रिप्ट पर अपने नोट विस्तार से लेते रहे । सोलह अगस्त को जब पंडित जी के साथ आख़िरी बैठक हुई तो उस दिन तक बम्बई में हमारी रिकार्डिंग की तमाम तारीख़ें और स्टुडियो बुक हो चुके थे । और सब से अहम बात जो तय हो चुकी थी, वह यह कि मीरा के गाने गायेंगी - वाणी जयराम

नवम्बर के शुरू में पंडित रविशंकर हिन्दुस्तान पहुंचे । २२ नवम्बर १९७६ से गानों की रिहर्सल शुरू हुई । ३० नवम्बर से महबूब स्टुडियो में वसंत मुदलियार कि देख रेख में 'मीरा' के गानों की रिकार्डिंग शुरू हुई और १५
दिसम्बर १९७६ तक 'मीरा' का पूरा म्युज़िक रिकार्ड हो चुका था! एक व्यक्ति, जिसने अनथक मेहनत की इस काम को पूरा करने में वह थे श्री विजय राघव राव, जो पंडित जी का दाहिना हाथ ही नहीं, दोनों हाथ हैं ।

मीरा का संगीत पूरा हुआ, शूटिंग की तैयारी शुरू हुई और...
अमिताभ बच्चन ने फ़िल्म छोड दी ।

'वर की तलाश फ़िर से शुरू हो गयी। फ़िल्म फिर रुक गयी ।

इस बार कई महीने लग गये। किसी नये कलाकार को भी लिया जा सकता था, मगर एक बडी मुश्किल थी कि उन्हीं दिनों 'मीरा' की ज़िन्दगी पर एक और फ़िल्म रिलीज़ हुई और फ़्लाप हो गयी । इंडस्ट्री में - मीरा की कहानी पर एक अभिशाप है - कहा जाने लगा । नये अभिनेता को लेकर प्रेमजी के लिये फ़िल्म बेचना ज़्यादा मुश्किल हो जाता । डिस्ट्रीब्यूटर्स की दिलचस्पी यूं ही टूट रही थी । उनका ख़याल था, प्रेम जी अब यह फ़िल्म पूरी नहीं कर पायेंगे । लेकिन एक बार फिर उनके हौसले की दाद देनी पडती है । चुपचाप वह अपने इंतजाम में लगे रहे । मुझसे कहा : 'आप शूटिंग शुरू कीजिये । 'मीरा' ख़ुद ही कोई रास्ता बतायेगी । अगर वह अपनी लगन से नहीं हटी, तो हन क्यों हट जायें ?'

२५ मई १९७७ से इस फ़िल्म की बक़ायदा शूटिंग शुरू हुई ।

राजा भोज के द्रुश्यों को छोडकर - जो भी शूटिंग मुमकिन थी - वह चलती रही । और फिर एक दिन अचानक ही राजा भोज मिल गये ।

विनोद खन्ना राजा भोज का रोल करने के लिये तैयार हो गये । वह महीना जनवरी का था, सन १९७८ ।

विनोद बस एक दिन के लिये सेट पर आये थे । बाक़ी तारीख़ें सितम्बर १९७८ से शुरू होती थीं और इस हिसाब से नवम्बर तक फ़िल्म पूरी हो जाती थी। अगस्त १९७८ में विनोद खन्ना ने फ़िल्म-लाइन त्याग देने का फ़ैसला कर लिया ।

जनवरी के उस एक दिन की बंदिश के लिये विनोद ने 'मीरा' पूरी करने की हामी भर ली थी । 'मीरा' समझिये कि बाल बाल बच गयी, वर्ना फिर वही तलाश शुरू हो जाती ! सितम्बर में विनोद ने शूटिंग शुरू की और इधर पंडित जी का तार भी मिला ।

मुझे ये बताने की मोहलत नहीं मिली कि सन १९७६ में जब फ़िल्म का संगीत रिकार्ड किया गया था तो हमने सितम्बर १९७७ की तारीख़ें फ़िल्म के बैकग्राउंड म्युज़िक के लिये तय कर ली थीं । अब सन १९७८ आ चुका था और पंडितजी पूछ रहे थे कि फ़िल्म का बैक-ग्राउन्ड म्युज़िच रिकार्ड होना कब शुरू होगा? क्योंकि इस साल सितम्बर में अगर बैक-ग्राउंड म्युज़िक न रिकार्ड हो पाया, तो पंडित जी अप्रैल १९७९ तक हिन्दुस्तान नहीं आ पायेंगे ।

प्रेम जी मुस्करा दिये । एक शेर पढा :

रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमां
हो रहेगा कुछ-ना-कुछ घबरायें क्या !

बडा प्यार आया प्रेमजी पर ।

१५ सितम्बर से २० सितम्बर १९७८ तक के बीच फ़िल्म का बैक-ग्राउंड म्युज़िक भी रिकार्ड कर लिया गया।

फ़िल्म का पूरा होना अभी काफ़ी दूर था । लेकिन पूरी फ़िल्म के हर सीन की अन्दाजन लम्बाई निकाल कर , बगैर फ़िल्म देखे , सिर्फ़ स्क्रिप्ट के भरोसे पर, हमने 'मीरा' का बैक-ग्राउंड म्युज़िक पूरा कर लिया । अक्तूबर से फिर शूटिंग शुरू कर ली । अब बैक-ग्राउंड म्युज़िक पहले था और 'सीन' बाद में ।

नवम्बर में फ़िल्म ख़त्म हो रही थी जब बम्बई में पीलिया की बीमारी फैली । इंडस्ट्री के बहुत से कलाकार उसकी लपेट में आ गये । पहली बार... हेमा की वजह से तारीख़ें कैंसिल हो गयीं । बेचारी बीमारी की गिरफ़्त में आ गयी ।

विनोद की तारीख़ों का मसला फिर वैसे ही सामने खडा है ।

हमारे एक 'मियां मुश्किल-कुशा' हैं - श्री तरन तारन । वही ऐसी मुश्किलें सुलझाते रहे हैं । यह मुश्किल भी उनके सामने रख दी है ।

यह दिसम्बर चल रहा है, आज की ताज़ा ख़बर के अनुसार ३० दिसम्बर को फ़िल्म ख़त्म कर पाऊंगा ।

अंग्रेज़ी में कहते हैं ना : 'टच-वुड'

१५ दिसम्बर, १९७८
गुलज़ार

बुधवार, सितंबर 26, 2007

Gulzar saab's new nazms on his birthday

जाते जाते एक छोटी सी नज़्म आप लोगों के लिये

अबे इसे पता नहीं क्या कहेंगे आप ऐसी नज़्म को...
देखने में पाजी लगती है.. वैसे है नहीं
या फिर देखने में नहीं लगती पर है पाजी....


ये बूढ़े लोग अजब होते हैं

छाज में डाल के
माज़ी के दिन
कंकर चुन कर
दांत तले रख कर उनको
फिर से तोड़ने की कोशिश करने लगते हैं

तीस बरस की उमर मे जब हुआ दांत ना टूटा
सत्तर साल की उम्र मे तो दांत ही टूटेगा

-*-

नये नये ही चाँद पे रहने आये थे
हवा ना पानी, गर्द ना कूड़ा
ना कोई आवाज़, ना हरक़त
ग्रेविटी पे तो पाँव नहीं पड़ते हैं कहीं पर
अपने वतन का भी अहसास नही होता

जो भी घुटन है जैसी भी है,
चल कर ज़मीं पर रहते हैं
चलो चलें, चल कर ज़मीं पर रहते हैं

बुधवार, अगस्त 08, 2007

विश्व हिन्दी सम्मेलन में गुलज़ार (gulzar at world hindi conference)

आठंवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन हाल ही में न्यूयार्क मे आयोजित हुआ.. सम्मेलन के दौरान आयोजित कवि सम्मेलन में गुलज़ार साब अपनी एक नयी नज़्म ’मकां’ के साथ श्रोताओं से रू.ब.रू हुए..

पेश है उनकी ये नज़्म





मकां -

मकां की ऊपरी मंज़िल पे अब कोई नहीं रहता,
वो कमरे बन्द हैं कब से
जो चौबीस सीढियां उन तक पहुंचती थी,
वो अब ऊपर नहीं जाती.

मकां की ऊपरी मंज़िल पर
अब कोई नहीं रहता

वहां पर कमरों मे इतना याद है मुझको,
खिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे,
बहुत से तो उठाने, फ़ेंकने, रखने में चूरा हो गये थे.

वहां एक बालकनी भी थी,
जहां एक बेंत का झूला लटकता था.
मेरा एक दोस्त था 'तोता',
वो रोज़ आता था,
उसको हरी मिर्ची खिलाता था,
उसी के सामने छत थी जहां
एक मोर बैठा, आसमान पर
रात भर मीठे सितारे चुगता रहता था.

मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं,
वो नीचे की मंज़िल पे रहते हैं,
जहां पर पियानो रखा है,
पुरानी पारसी स्टाइल का
फ़्रेजर से खरीदा था.
मगर कुछ बेसुरी आवाज़ें करता है,
कि उसकी रीड्स सारी हिल गयी हैं,
सुरों पर दूसरे सुर चढ गये हैं


उसी मंज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थी...
[मकां ज़रा बड़ा है इसलिये नज़्म भी बढ़ गयी है... माफ़ कीजियेगा, कमरे ज्यादा हैं..]

जहां पुरखों की तस्वीरें लटकती थी
मैं सीधा करता रहता था
हवा फ़िर टेढा कर जाती
बहू को मूंछो वाले सारे पुरखे
’क्लिशे’ लगते थे,
मेरे बच्चों ने आखिर उनको कीलों से उतारा
पुराने न्यूज़पेपर में
उन्हें महफ़ूज़ करके रख दिया था,
मेरा एक भांजा ले जाता है
फ़िल्मों में कभी सेट पर लगाता है
किराया मिलता है उनसे.

मेरी मंज़िल पे मेरे सामने मेहमानखाना है
मेरे पोते कभी अमरिका से आयें तो रुकते हैं
अलग साइज़ में आते हैं,
जितनी बार आते है
खुदा जाने वो ही आते हैं या
हर बार कोई दूसरा आता है

वो एक कमरा जो पीछे की तरफ़ बन्द है
जहां बत्ती नहीं जलती
वहां एक रोज़री रखी है वो उस से महकता है
वहां वो दाई रहती थी
जिसने तीन बच्चों को बड़ा करने में
अपनी उम्र दे दी थी
मरी तो मैने दफ़नाया नहीं,
महफ़ूज़ करके रख दिया उसे

और उसके बाद एक दो सीढ़ियां है
नीचे तहखाने में जाती है
जहां खामोशी रोशन है,
सुकूं सोया है
बस इतनी सी पहलू में जगह रखकर
कि जब मैं सीढ़ियों से नीचे आऊं
तो उसी के पहलू में, बाजुओं पर सर रख कर गले लग जाऊं
सो जाऊं

मकां की ऊपरी मंज़िल पे अब कोई नहीं रहता....

गुलज़ार