शिमला के सफ़र का एक मंज़र :
सर्दी थी और कोहरा था
और सुबह की बस आधी आँख खुली थी,
आधी नींद में थी!
शिमला से जब नीचे आते
एक पहाड़ी के कोने में
बस्ते जितनी बस्ती थी इक
बटवे जितना मंदिर था
साथ लगी मस्जिद, वो भी लॉकिट जितनी
नींद भरी दो बाहों
जैसे मस्जिद के मीनार गले में मन्दिर के,
दो मासूम खुदा सोए थे!
एक बूढ़े झरने के नीचे!!
Shimla Ke Safar ka Ek Manzar:
sardI thI aur koharaa thaa
aur subah kI bas aadhI aa.nkh khulI thI,
aadhI neend me.n thI!
shimla se jab nIche aate
ek pahaaDI ke kone me.n
baste jitanI bastI thI ik
baTave jitanaa mandir tha
saath lagI masjid, vo bhI locket jitanI
neend bharI do baaho.n jaise masjid ke mInaar gale me.n mandir ke,
do maasoom khudaa soye the!
ek booDhe jharne ke neeche
[Published in 15-5-75, a new poetry collection on Vani Prakashan, Delhi]
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मंगलवार, सितंबर 28, 2010
गुरुवार, अगस्त 19, 2010
माँ (mother)
गुलज़ार साब के जन्मदिन पर प्रस्तुत है उनकी एक अनूठी पर्सनल नज़्म जो उन्होनें अपनी माँ को समर्पित की है!
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं
लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं
यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं
कान में छेद है
पैदायशी आया होगा
तूने मन्नत के लिये
कान छिदाया होगा
सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा
एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा
जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी
मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं
लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं
यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं
कान में छेद है
पैदायशी आया होगा
तूने मन्नत के लिये
कान छिदाया होगा
सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा
एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा
जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी
मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
रविवार, मई 23, 2010
एक और मंज़र - ट्रैफिक सिग्नल का
होंठ हिलते हैं भिखारी के, सुनाई नहीं देता
हाथ के लफ़ज़ उछलते हैं, वो कुछ बोल रहा है,
थपथपाता है हर इक कार का शीशा आकर
और उजलत में है
ट्रैफ़िक के सिग्नल पे नज़र है!
चेंज है तो सही
कौन इस गर्मी में अब कार का शीशा खोले,
अगले सिगनल पे ही सही
रोज़ कुछ देना ज़रूरी है, ख़ुदा राज़ी रहे!
[नया ज्ञानोदय [अप्रैल २०१०] से साभार]
हाथ के लफ़ज़ उछलते हैं, वो कुछ बोल रहा है,
थपथपाता है हर इक कार का शीशा आकर
और उजलत में है
ट्रैफ़िक के सिग्नल पे नज़र है!
चेंज है तो सही
कौन इस गर्मी में अब कार का शीशा खोले,
अगले सिगनल पे ही सही
रोज़ कुछ देना ज़रूरी है, ख़ुदा राज़ी रहे!
[नया ज्ञानोदय [अप्रैल २०१०] से साभार]
एक मंज़र गर्मी का
कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के
लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..
ख़याल होता है, गोर्की है!
पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
जो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबें
डिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...
या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई, चिपक गया है
समय पलटता नहीं वहां से
कहानी आगे बढ़ती नहीं है... और कहानी रुकी हुई है।
ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी।
हथेली पे लेके दिन की फक्की
मैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर
ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता
ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों का
जस भरी रात गर्मियों की
- गुलज़ार
[नया ज्ञानोदय [अप्रैल २०१०] से साभार]
दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के
लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..
ख़याल होता है, गोर्की है!
पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
जो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबें
डिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...
या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई, चिपक गया है
समय पलटता नहीं वहां से
कहानी आगे बढ़ती नहीं है... और कहानी रुकी हुई है।
ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी।
हथेली पे लेके दिन की फक्की
मैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर
ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता
ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों का
जस भरी रात गर्मियों की
- गुलज़ार
[नया ज्ञानोदय [अप्रैल २०१०] से साभार]
मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010
इब्नबतूता का भूत [The ghost of Ibn-Batuta]
सुबह सुबह अखबार ने जब दरवाजे पर दस्तक दी तो मालूम हुआ कि इब्नबतूता के भूत साथ में तशरीफ़ लाए हैं। आने का सबब पूछा तो पता चला कि कुछ चिलप्पों करने वाले तथाकथित साहित्यकारों ने शोर मचा कर उन्हें नींद से उठा दिया है। शोर ये कि गुलज़ार साब ने इब्नबतूता का जूता चुरा लिया है।

गुलज़ार ने चुराया इब्नबतूता पहन के जूता
भूत जनाब बहुत परेशान लग रहे थे। वैसे भी अपने समय में पैदल इतना सारा जहाँ घूमे थे कि सदियों तक उसकी थकान खत्म ना हो। अच्छे खासे इतिहास के पन्नों में आराम फ़रमा रहे थे, नींद से उठा कर अखबार की सुर्खियों में यूं अलसुबह खड़ा कर देने के फ़रमान से तकलीफ़ किसको नहीं होगी। और उस पर ये भी कि ना सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के इब्नबतूता से उनका कोई वास्ता है और ना ही गुलज़ार के। बोले कि ये बिलावजह हंगामा क्युं है बरपा?
हमने कहा जनाब, ये जूते का दौर है, हर तरफ़ जूते का जोर है, चाहे इराक़ हो या भारत, नेता हो या अभिनेता, राजनीति हो या साहित्य का अखाड़ा, विरोध का इन दिनो सबसे बड़ा औज़ार बन गया है जूता। अब यहाँ के साहित्यकारों के हाथ में आपका जूता पड़ गया है, तो उछालने की होड़ लगी हुई है। कुछ तथाकथित साहित्यकार जो अपनी रचनाओं से अपने लिये जगह नहीं बना सके, आपके जूते के विवाद को उछाल के अखबारों की सुर्खियों में जगह बनाने की कोशिश में जुटे हैं। उनको परेशानी इस बात से हो रही है कि गुलज़ार साब ने सर्वेश्वर जी की कविता से आपका नाम और जूता चुरा लिया है।
"मगर मेरे नाम का कॉपीराईट क्या सर्वेश्वर जी के पास है? क्या मेरी पहचान सिर्फ़ उनकी कविता से है, क्या लोग ये भूल गये कि मेरे कई यात्रा वृतांत दुनिया की कई भाषाओं में छप चुके हैं?" भूत जनाब का प्रश्न था।
"शायद भूल ही गये हैं" मैनें बोला तो नहीं वरना जनाब को बड़ी निराशा होती, बस मन ही मन सोचा । फिर सोचा कि शोर बरपाने वालों को इब्नबतूता से क्या लेना देना, उनका लेना देना तो सर्वेश्वर जी से भी नहीं है। हमेशा किसी ना किसी बात पे परेशान रहते हैं ये लोग। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी पर भी पत्थर (या जूता) उछालने की शायद आदत सी हो गयी है इक जमात को। गुलज़ार साब से कुछ खास शिकायतें रहती हैं, हिन्दी साहित्यकारों का एक तबका कहता है उर्दू के शायर हैं, उर्दू वाले कहते हैं आज़ाद हिन्दोस्तानी में लिखते हैं। शायर-साहित्यकार ये भी कहते हैं फ़िल्मों के गीतकार हैं। उनकी आर्ट की आज़ादपरस्ती, ऐसे शोर दबाने की बहुत कोशिश करते रहते हैं
"वैसे इस बार इन लोगों को असल में किस बात से परेशानी है"? भूत जनाब का अगला प्रश्न था
जनाब, इनका तर्क ये है कि सर्वेश्वर जी बच्चों के लिये कविता लिखी, गुलज़ार साब ने उस कविता को चुरा कर फ़िल्मी गीत का रूप दे दिया है। कुछ साहित्यकार लोगों को इसलिए परेशानी है कि आपका नाम साहित्य से उठा कर फ़िल्मी गीत में ले लिया है और कुछ साहित्यकारों को ये कि गुलज़ार साब ने बिना श्रेय दिये सर्वेश्वर जी की कविता में से आपका नाम और जूता कॉपी किया है। अब सर्वेश्वर जी की कविता या गुलज़ार साब के गीत दोनों में आप की उपस्थिति सिर्फ़ इसलिए है कि आपका नाम जूता के साथ अच्छा ’राइम’ होता है, आपके नाम के ’साउंड’ मॆं बहुत दम है, जो एक कविता या गीत में प्रभाव के लिये बहुत ज़रूरी है। जहाँ तक संदर्भ की बात है दोनों ने आपका और आपके जूते का उपयोग बिलकुल अलग तरीके से किया है। सर्वेश्वर जी की कविता जहां बच्चों के लिये मज़ेदार ’नॉनसेन्सिकल’ फ़ारमेट मे लिखी गई है वहीं गुलज़ार साब ने इसका उपयोग फ़िल्म की स्क्रिप्ट और सिचुएशन के आधार पे किया है। फ़िल्म की शुरुआत में जहां दो चोर, अपने बॉस के पिंजरे से फ़ुर्र हो रहे है, आज़ाद हो रहे हैं... इधर से उधर घुमक्कड़ों की तरह भाग रहे हैं, दबे पाँव निकल रहे हैं, उन्होने जूता पहना नहीं है, बल्कि बगल मे दबाया है क्युंकि पहनने के बाद जूता आवाज़ करेगा और उनका फ़ुर्र होना, भागना आसान नहीं होगा। वैसे मैं क्या फ़ैसला करूं, जनाब आप खुद ही दोनों (कविता और गीत) एकसाथ पढ़ लें और कि क्या ये वाकई में कॉपी है?
"क्या कहते हैं जनाब"?
"पहली बात तो दोनो रचनाओं के उपयोग और संदर्भ में कोई समानता मुझे तो नज़र नहीं आई । और अगर लोगों को ये आपति है कि गुलज़ार साब ने गीत के साथ सर्वेश्वर जी की कविता का ज़िक्र नहीं किया, तो वे ये नहीं कहते कि सर्वेश्वर जी ने कविता में मेरा नाम मेरे किस किस्से या किताब से पढ़ कर दिया है। उनके जेहन में मेरा नाम भी तो मेरा ही कोई किस्सा पढ़ कर आया होगा" जनाब का जवाब था। "बेवजह का मसला खड़ा किया है कुछ लोगों ने और मेरी नींद भी खराब कर दी। है अब मैं भी चिड़िया की तरह फ़ुर्र होता हूं" कह कर जनाब गायब हो गये।
मैं सोच रहा था कि गुलज़ार साब पहले भी कई बार इस तरह के आरोपों के दौर से गुजरे हैं, और खासकर तब भी जब वो अपनी तरफ़ से चला कर घोषित करते रहे हैं कि मिसरा ग़ालिब का है और कैफ़ियत अपनी अपनी, या बुल्लेशाह और अमीर खुसरो की प्रेरणा को कभी नहीं नकारा बल्कि आगे बढ़ कर पहले लोगों को बताया। जबकि फ़िल्म उद्योग में अनेकोनेक, अनगिनत ऐसे उदाहरण रोज़ ही मिलते हैं जहां फ़िल्म, कहानी, गीत, दृश्य, स्क्रिप्ट, नृत्य आदि हूबहू उठा लिये जाते हैं मगर राष्ट्रीय दैनिकों में मुख्य-पृष्ठ पे चोरी के रूप मे उछाले नहीं जाते। आज की खबर निश्चित रूप से स्वार्थी तत्वों द्वारा इक निश्चित एजेंडा के तहत उछाला गया जूता है।
शायद ऐसे ही वाकयों और लोगों के लिये गुलज़ार साब ने एक बार लिखा था
[नोट : सर्वेश्वर जी की कविता बचपन में पराग में पढ़ी और स्कूल में गुनी-सुनी-सुनाई है। मेरे लिए सर्वेश्वर जी बहुत आदरणीय व्यक्तित्व और साहित्य के अविस्मरणीय हस्ताक्षर रहे हैं। मगर उन लोगों से तकलीफ़ हो रही है जो उनके नाम से इस तरह से जूते उछाल रहे हैं। इसिलिए ये एक रिएक्शन है आज की खबर पर]
- पवन झा
गुलज़ार ने चुराया इब्नबतूता पहन के जूता
भूत जनाब बहुत परेशान लग रहे थे। वैसे भी अपने समय में पैदल इतना सारा जहाँ घूमे थे कि सदियों तक उसकी थकान खत्म ना हो। अच्छे खासे इतिहास के पन्नों में आराम फ़रमा रहे थे, नींद से उठा कर अखबार की सुर्खियों में यूं अलसुबह खड़ा कर देने के फ़रमान से तकलीफ़ किसको नहीं होगी। और उस पर ये भी कि ना सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के इब्नबतूता से उनका कोई वास्ता है और ना ही गुलज़ार के। बोले कि ये बिलावजह हंगामा क्युं है बरपा?
हमने कहा जनाब, ये जूते का दौर है, हर तरफ़ जूते का जोर है, चाहे इराक़ हो या भारत, नेता हो या अभिनेता, राजनीति हो या साहित्य का अखाड़ा, विरोध का इन दिनो सबसे बड़ा औज़ार बन गया है जूता। अब यहाँ के साहित्यकारों के हाथ में आपका जूता पड़ गया है, तो उछालने की होड़ लगी हुई है। कुछ तथाकथित साहित्यकार जो अपनी रचनाओं से अपने लिये जगह नहीं बना सके, आपके जूते के विवाद को उछाल के अखबारों की सुर्खियों में जगह बनाने की कोशिश में जुटे हैं। उनको परेशानी इस बात से हो रही है कि गुलज़ार साब ने सर्वेश्वर जी की कविता से आपका नाम और जूता चुरा लिया है।
"मगर मेरे नाम का कॉपीराईट क्या सर्वेश्वर जी के पास है? क्या मेरी पहचान सिर्फ़ उनकी कविता से है, क्या लोग ये भूल गये कि मेरे कई यात्रा वृतांत दुनिया की कई भाषाओं में छप चुके हैं?" भूत जनाब का प्रश्न था।
"शायद भूल ही गये हैं" मैनें बोला तो नहीं वरना जनाब को बड़ी निराशा होती, बस मन ही मन सोचा । फिर सोचा कि शोर बरपाने वालों को इब्नबतूता से क्या लेना देना, उनका लेना देना तो सर्वेश्वर जी से भी नहीं है। हमेशा किसी ना किसी बात पे परेशान रहते हैं ये लोग। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी पर भी पत्थर (या जूता) उछालने की शायद आदत सी हो गयी है इक जमात को। गुलज़ार साब से कुछ खास शिकायतें रहती हैं, हिन्दी साहित्यकारों का एक तबका कहता है उर्दू के शायर हैं, उर्दू वाले कहते हैं आज़ाद हिन्दोस्तानी में लिखते हैं। शायर-साहित्यकार ये भी कहते हैं फ़िल्मों के गीतकार हैं। उनकी आर्ट की आज़ादपरस्ती, ऐसे शोर दबाने की बहुत कोशिश करते रहते हैं
"वैसे इस बार इन लोगों को असल में किस बात से परेशानी है"? भूत जनाब का अगला प्रश्न था
जनाब, इनका तर्क ये है कि सर्वेश्वर जी बच्चों के लिये कविता लिखी, गुलज़ार साब ने उस कविता को चुरा कर फ़िल्मी गीत का रूप दे दिया है। कुछ साहित्यकार लोगों को इसलिए परेशानी है कि आपका नाम साहित्य से उठा कर फ़िल्मी गीत में ले लिया है और कुछ साहित्यकारों को ये कि गुलज़ार साब ने बिना श्रेय दिये सर्वेश्वर जी की कविता में से आपका नाम और जूता कॉपी किया है। अब सर्वेश्वर जी की कविता या गुलज़ार साब के गीत दोनों में आप की उपस्थिति सिर्फ़ इसलिए है कि आपका नाम जूता के साथ अच्छा ’राइम’ होता है, आपके नाम के ’साउंड’ मॆं बहुत दम है, जो एक कविता या गीत में प्रभाव के लिये बहुत ज़रूरी है। जहाँ तक संदर्भ की बात है दोनों ने आपका और आपके जूते का उपयोग बिलकुल अलग तरीके से किया है। सर्वेश्वर जी की कविता जहां बच्चों के लिये मज़ेदार ’नॉनसेन्सिकल’ फ़ारमेट मे लिखी गई है वहीं गुलज़ार साब ने इसका उपयोग फ़िल्म की स्क्रिप्ट और सिचुएशन के आधार पे किया है। फ़िल्म की शुरुआत में जहां दो चोर, अपने बॉस के पिंजरे से फ़ुर्र हो रहे है, आज़ाद हो रहे हैं... इधर से उधर घुमक्कड़ों की तरह भाग रहे हैं, दबे पाँव निकल रहे हैं, उन्होने जूता पहना नहीं है, बल्कि बगल मे दबाया है क्युंकि पहनने के बाद जूता आवाज़ करेगा और उनका फ़ुर्र होना, भागना आसान नहीं होगा। वैसे मैं क्या फ़ैसला करूं, जनाब आप खुद ही दोनों (कविता और गीत) एकसाथ पढ़ लें और कि क्या ये वाकई में कॉपी है?
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना | गुलज़ार |
इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में थोड़ी हवा नाक में घुस गई थोड़ी घुस गई कान में कभी नाक को कभी कान को मलते इब्नबतूता इसी बीच में निकल पड़ा उनके पैरों का जूता उड़ते उड़ते उनका जूता पहुंच गया जापान में इब्नबतूता खड़े रह गये मोची की दूकान में | इब्ने बतूता, बगल में जूता पहने तो करता है चुर्रर उड उड आवे, दाना चुगेवे उड जावे चिडिया फुर्रर अगले मोड पे, मौत खड़ी है अरे मरने की भी क्या जल्दी है होर्न बजाके, आ बगियन में हो दुर्घटना से देर भली है चल उड जा उड जा फुर फुर दोनों तरफ से बजती है ये आय हाय जिंदगी क्या ढोलक है हॉर्न बजाके आ आ बगियन में अरे थोड़ा आगे गतिरोधक है इब्ने बतूता.. |
"क्या कहते हैं जनाब"?
"पहली बात तो दोनो रचनाओं के उपयोग और संदर्भ में कोई समानता मुझे तो नज़र नहीं आई । और अगर लोगों को ये आपति है कि गुलज़ार साब ने गीत के साथ सर्वेश्वर जी की कविता का ज़िक्र नहीं किया, तो वे ये नहीं कहते कि सर्वेश्वर जी ने कविता में मेरा नाम मेरे किस किस्से या किताब से पढ़ कर दिया है। उनके जेहन में मेरा नाम भी तो मेरा ही कोई किस्सा पढ़ कर आया होगा" जनाब का जवाब था। "बेवजह का मसला खड़ा किया है कुछ लोगों ने और मेरी नींद भी खराब कर दी। है अब मैं भी चिड़िया की तरह फ़ुर्र होता हूं" कह कर जनाब गायब हो गये।
मैं सोच रहा था कि गुलज़ार साब पहले भी कई बार इस तरह के आरोपों के दौर से गुजरे हैं, और खासकर तब भी जब वो अपनी तरफ़ से चला कर घोषित करते रहे हैं कि मिसरा ग़ालिब का है और कैफ़ियत अपनी अपनी, या बुल्लेशाह और अमीर खुसरो की प्रेरणा को कभी नहीं नकारा बल्कि आगे बढ़ कर पहले लोगों को बताया। जबकि फ़िल्म उद्योग में अनेकोनेक, अनगिनत ऐसे उदाहरण रोज़ ही मिलते हैं जहां फ़िल्म, कहानी, गीत, दृश्य, स्क्रिप्ट, नृत्य आदि हूबहू उठा लिये जाते हैं मगर राष्ट्रीय दैनिकों में मुख्य-पृष्ठ पे चोरी के रूप मे उछाले नहीं जाते। आज की खबर निश्चित रूप से स्वार्थी तत्वों द्वारा इक निश्चित एजेंडा के तहत उछाला गया जूता है।
शायद ऐसे ही वाकयों और लोगों के लिये गुलज़ार साब ने एक बार लिखा था
कहने वालों का कुछ नहीं जाता
सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढे जवाब ज़ख्मों के
लोग तो बस सवाल करते हैं!
[नोट : सर्वेश्वर जी की कविता बचपन में पराग में पढ़ी और स्कूल में गुनी-सुनी-सुनाई है। मेरे लिए सर्वेश्वर जी बहुत आदरणीय व्यक्तित्व और साहित्य के अविस्मरणीय हस्ताक्षर रहे हैं। मगर उन लोगों से तकलीफ़ हो रही है जो उनके नाम से इस तरह से जूते उछाल रहे हैं। इसिलिए ये एक रिएक्शन है आज की खबर पर]
- पवन झा
सोमवार, अक्टूबर 12, 2009
Jugalbandi gulzar - jagjit singh in hyderabad [जुगलबन्दी - गुलज़ार-जगजीत सिंह, हैदराबाद में]
अक्तूबर 11, 2009 (October 11, 2009)
वो शाम बहुत हसीन थी! (report by K Venkat)
हैदराबादी नवाबों के चौमोहोल्ला पैलेस में, खुले आसमां के नीछे, जहां जगजीत सिंह की आवाज़ हवा में सराबोर हुई, वहीं गुलज़ार साब ने अपनी चन्द नज़्मों से ज़िन्दगी के कुछ नये "इमजेस" बना दिये. यूं तो बहुत बार, कई शहरों में जगजीत जी को सुना, मगर कल महफ़िल कुछ और ही रंग में थी. रात तो हर रोज़ होती थी मगर, इस बार, चांद भी था.
गुलज़ार साब और जगजीत जी एक बग्घी में बैठ कर मन्च के पास पधारे, और आते ही दोनों को गुल-पोशी की गयी. फिर जगजीत जी ने महफ़िल की शुरुआत अपनी ग़ज़लों से की. तकरीबन एक घन्टे बाद, जब तक हम बेसब्र हो चले थे, गुलज़ार साब को जगजीत जी ने मन्च पर बुलाया और उनका परिचय भी अपने ही अन्दाज़ में किया "गुलज़ार साब ’मल्टी फ़ेसेटेड पर्सनैलिटि हैं मगर इनके पास एक ही ड्रैस है... (गुलज़ार साब अपने ट्रेडमार्क सफ़ेद लिबास में थे) ...ये प्रोड्य़ुसर, डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राईटर, डायलोग राईटर, लिरिसिस्ट हैं और आज हमारी खुशकिस्मति हैं की वो हमारे बीच कुछ नज़्में लेकर आये हैं"
फिर गुलज़ार साब ने शुरुआत की, के किस तरह ज़िंदगी एक ’हिरन’ की तरह है जिसके पीछे हम भाग रहें हैं और आखिर में ये समझ नहीं आता के कौन किसके पीछे भाग रहा है. फिर हैदराबाद को सलाम करते हुए उन्होने उर्दू ज़बान पे एक नज़्म कही जो मेरे खयाल से, हर उस शख़्स को सुननी चाहिये, जिसे ईश्वर ने बोलने की शक्ति दी हो. फिर बात चली आज के दौर की जहां सब कुछ कम्प्युटराईज़्ड हो गया है और हुम किताबों से किस तरह दूर हो चले हैं. उन्होने कई नज़्मों में अंग्रेज़ी अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल किया मगर जगजीत जी को एक तसल्ली भी दिलायी - "जगजीत मैं अंग्रेज़ी का इस्तेमाल गज़लों में नहीं करूंगा. मगर नज़्म में आज कल के इन नये लफ़्ज़ों का इस्तेमल जायज़ है. अब मैं ‘कम्प्यूटर’ को कुछ और तो नहीं कह सकता". ज़िंदगी के कुछ इमजेस की पोएटिक स्केचेस खींचे, एक नज़्म उम्र के नज़रिये पे पढ़ि (‘अब मैं मकान के ऊपरी मन्ज़िल पे रहता हूं’) और एक नज़्म पाकिस्तान और अपने बीच चल रहे उथल-पुथल के बारे में थी.
आखिर में गुलज़ार साब ने जगजीत जी के बारे में कहा "जगजीत की आवाज़ में सुन कर मुझे मेरे ही लिखी हुई गज़लें, और बेहतर लगने लगती हैं. जगजीत जिस तरह गज़ल को समझ्ते हैं.. किस लफ़्ज़ पे कितना वज़न देना चाहिये और कैसे मनी को उभारना चाहिये, ये उनसे बेहतर कोई और नहीं जानता. ये मैनें पहले भी कहा था, और अब भी कह रहा हूं, "ग़ालिब की आवाज़ - जगजीत हैं" ये कहते हुए ग़ालिब का इन्ट्रोडक्शन "बल्लिमारा के मोहल्ले" नज़्म को पढ़ कर कराया. उन्होने साथ में जगजीत जी से ये इल्तेज़ा भी की "जगजीत जब मैन मन्च से उतरूं और दूसरे हाफ़ की जब शुरुआत करो तो ये मेरी गुज़ारिश है, की वो, ग़ालिब के ग़ज़ल से हो. ये कह कर जब गुलज़ार साब मन्च से उतरे तो जगजीत ने समा की कैफ़ियत को खूब समझ कर सुना दिया "हज़ारों ख्वाहिशैं ऐसीं"
कैमरा नहीं लेकर गया था मगर सैल-फ़ोन से दो-तीन तस्वीरें ली हैं और गुलज़ार साब के सभी नज़्म रिकार्ड भी कर लिये हैं. मगर अभी तक मौका नहीं मिला की उन्हें लैप्टॉप में ट्रान्सफ़र करके आपतक भेज सकूं. अगर रिकार्डिंग क्वालिटी खराब रही तो ये कोशिश ज़रूर रहेगी की सारे नज़्म इन्ग्लिश स्क्रिप्ट लिख कर आपके साथ शेयर करूं.
जय हो!
-वैंकट (हैदराबाद से)
वो शाम बहुत हसीन थी! (report by K Venkat)
हैदराबादी नवाबों के चौमोहोल्ला पैलेस में, खुले आसमां के नीछे, जहां जगजीत सिंह की आवाज़ हवा में सराबोर हुई, वहीं गुलज़ार साब ने अपनी चन्द नज़्मों से ज़िन्दगी के कुछ नये "इमजेस" बना दिये. यूं तो बहुत बार, कई शहरों में जगजीत जी को सुना, मगर कल महफ़िल कुछ और ही रंग में थी. रात तो हर रोज़ होती थी मगर, इस बार, चांद भी था.
गुलज़ार साब और जगजीत जी एक बग्घी में बैठ कर मन्च के पास पधारे, और आते ही दोनों को गुल-पोशी की गयी. फिर जगजीत जी ने महफ़िल की शुरुआत अपनी ग़ज़लों से की. तकरीबन एक घन्टे बाद, जब तक हम बेसब्र हो चले थे, गुलज़ार साब को जगजीत जी ने मन्च पर बुलाया और उनका परिचय भी अपने ही अन्दाज़ में किया "गुलज़ार साब ’मल्टी फ़ेसेटेड पर्सनैलिटि हैं मगर इनके पास एक ही ड्रैस है... (गुलज़ार साब अपने ट्रेडमार्क सफ़ेद लिबास में थे) ...ये प्रोड्य़ुसर, डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राईटर, डायलोग राईटर, लिरिसिस्ट हैं और आज हमारी खुशकिस्मति हैं की वो हमारे बीच कुछ नज़्में लेकर आये हैं"
फिर गुलज़ार साब ने शुरुआत की, के किस तरह ज़िंदगी एक ’हिरन’ की तरह है जिसके पीछे हम भाग रहें हैं और आखिर में ये समझ नहीं आता के कौन किसके पीछे भाग रहा है. फिर हैदराबाद को सलाम करते हुए उन्होने उर्दू ज़बान पे एक नज़्म कही जो मेरे खयाल से, हर उस शख़्स को सुननी चाहिये, जिसे ईश्वर ने बोलने की शक्ति दी हो. फिर बात चली आज के दौर की जहां सब कुछ कम्प्युटराईज़्ड हो गया है और हुम किताबों से किस तरह दूर हो चले हैं. उन्होने कई नज़्मों में अंग्रेज़ी अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल किया मगर जगजीत जी को एक तसल्ली भी दिलायी - "जगजीत मैं अंग्रेज़ी का इस्तेमाल गज़लों में नहीं करूंगा. मगर नज़्म में आज कल के इन नये लफ़्ज़ों का इस्तेमल जायज़ है. अब मैं ‘कम्प्यूटर’ को कुछ और तो नहीं कह सकता". ज़िंदगी के कुछ इमजेस की पोएटिक स्केचेस खींचे, एक नज़्म उम्र के नज़रिये पे पढ़ि (‘अब मैं मकान के ऊपरी मन्ज़िल पे रहता हूं’) और एक नज़्म पाकिस्तान और अपने बीच चल रहे उथल-पुथल के बारे में थी.
आखिर में गुलज़ार साब ने जगजीत जी के बारे में कहा "जगजीत की आवाज़ में सुन कर मुझे मेरे ही लिखी हुई गज़लें, और बेहतर लगने लगती हैं. जगजीत जिस तरह गज़ल को समझ्ते हैं.. किस लफ़्ज़ पे कितना वज़न देना चाहिये और कैसे मनी को उभारना चाहिये, ये उनसे बेहतर कोई और नहीं जानता. ये मैनें पहले भी कहा था, और अब भी कह रहा हूं, "ग़ालिब की आवाज़ - जगजीत हैं" ये कहते हुए ग़ालिब का इन्ट्रोडक्शन "बल्लिमारा के मोहल्ले" नज़्म को पढ़ कर कराया. उन्होने साथ में जगजीत जी से ये इल्तेज़ा भी की "जगजीत जब मैन मन्च से उतरूं और दूसरे हाफ़ की जब शुरुआत करो तो ये मेरी गुज़ारिश है, की वो, ग़ालिब के ग़ज़ल से हो. ये कह कर जब गुलज़ार साब मन्च से उतरे तो जगजीत ने समा की कैफ़ियत को खूब समझ कर सुना दिया "हज़ारों ख्वाहिशैं ऐसीं"
कैमरा नहीं लेकर गया था मगर सैल-फ़ोन से दो-तीन तस्वीरें ली हैं और गुलज़ार साब के सभी नज़्म रिकार्ड भी कर लिये हैं. मगर अभी तक मौका नहीं मिला की उन्हें लैप्टॉप में ट्रान्सफ़र करके आपतक भेज सकूं. अगर रिकार्डिंग क्वालिटी खराब रही तो ये कोशिश ज़रूर रहेगी की सारे नज़्म इन्ग्लिश स्क्रिप्ट लिख कर आपके साथ शेयर करूं.
जय हो!
-वैंकट (हैदराबाद से)
शनिवार, सितंबर 12, 2009
मंगलवार, अप्रैल 14, 2009
चौपाल में गुलज़ार साब की ऑस्कर जीत का जश्न [Oscar Victory Celebrations at Chaupal]
रविवार 12 अप्रैल, स्थान-राजेन्द्र गुप्ता जी की बगीची, चौपाल फिर से जमी. मगर इस बार बहुत ही खास मक़सद के साथ. गुलज़ार साब की ऑस्कर जीत का जश्न मनाने और गुलज़ार साब को इस उपलब्धि के लिये सम्मानित करने के लिये. और जब गुलज़ार साब आमंत्रित हों तो चौपाली रसिकों का एक मक़सद अपने आप जुड़ जाता है, उनको जी भर के सुनने का । तो साहेबान महफ़िल जमी और क्या खूब जमी। मुम्बई की उमस भरी गर्मी को मात देते हुए पसीने से तरबतर 150 के ऊपर, चौपाली रसिक सुरों और कविताओं की बौछार से 5 घंटे तक सराबोर होते रहे।
महफ़िल की शुरुआत हुई गज़ल गायिका सीमा सहगल के गायन से जिन्होने गुलज़ार साब के शब्दों (यार जुलाहे) को धुन और आवाज़ में बांध कर प्रस्तुत किया। जावेद सिद्दिकी साब, अपनी बेटी लुबना, दामाद सलीम आरिफ़ और नातियों फ़राज़ और फ़ैज़ी(तहरीर में ईदगाह का हामिद) के साथ प्रस्तुत थे और तीनों पीढियों ने गुलज़ार साब को अपने अपने ढंग से प्रस्तुत किया.. जावेद साब ने गुलज़ार साब के बहुआयामी व्यक्तित्व के कुछ जाने और कुछ अनजाने पहलुओं का जिक्र किया। लुबना और सलीम की जोड़ी ने गुलज़ार साब द्वारा लिखित नाटक "खराशें" के कुछ अंश प्रस्तुत किये वहीं फ़ैज़ी ने बच्चों की कविता से बहुत तालियां बटोरी।
साहित्यकार विश्वनाथ सचदेव ने गुलज़ार साब के साथ बांटे गये मज़ेदार लम्हों की याद ताज़ा की । पूना से आये फ़िल्म इन्स्टीट्यूट FTII के निदेशक (धुनों की यात्रा के लेखक) पंकज राग ने अपनी किताब से कुछ अंश पढ़ कर सुनाये। किशोर कदम (सौमित्र) ने गुलज़ार साब की डायरी का काव्य पाठ किया तो शेखर सेन ने उनके कुछ फ़िल्मी गीत सुनाये । हास्य और व्यंग के एक वर्तमान हस्ताक्षर सुभाष काबरा ने अपने गुलज़ार साब पे केन्द्रित एक मज़ेदार व्यंग पाठ "हाय, हम गुलज़ार ना हुए" से चौपाल की सभा को एक नया माहौल दिया । फिर बारी थी स्टेज पे आने की भूपेन्द्र की और शुरुआत की उन्होने "थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा आसमां" के साथ और उनके गाते गाते शब्द भूलने का पुरुस्कार श्रोताओं को मिला एक अनूठी जुगलबन्दी के साथ, भुपेन्द्र और विशाल भारद्वाज के साथ... दर-असल भूपी जी को, विशाल श्रोताओं के बीच में से बार बार सही शब्द याद दिला रहे थे... गुलज़ार साब ने विशाल को स्टेज पे धकेल दिया और विशाल और भूपी जी ने "बादलों से काट काट कर" और "तेरे जाने से कुछ बदला नहीं" को जुगलबंदी में पेश कर सबका मज़ा दोगुना कर दिया।
इनके गायन के बाद वो पल आया, जिसके लिये ये महफ़िल सजाई गई। कार्यक्रम का संचालन कर रहे चौपाल के "एंकर" अतुल तिवारी ने गुलज़ार साब को सम्मानित करने के लिये मंच पे आमंत्रित किया पुष्पा भारती जी (स्व. धर्मवीर भारती की पत्नी) को । पुष्पा जी ने गुलज़ार साब को ट्रॉफ़ी प्रदान कर सम्मानित किया और चौपाल के इतिहास में एक यादगार पल की प्रविष्टी कर दी ।
अशोक बिन्दल (जिनको ट्रॉफ़ी की खूबसूरती का श्रेय भी जाना चाहिये) ने गुलज़ार साब को अपनी कविता "ठहरी हुई आवाज़" समर्पित की। ट्रॉफ़ी पर पवन की ऑस्कर जीत की एक त्रिवेणी अंकित थी, जिसको मंच पे पढ़ा गया।

"ये सोना जो इतना चमक रहा है
अपनी किस्मत पे इतरा रहा है शायद!
तेरे नूर के आगे फिर भी फीका है।"
चित्रकार चरण शर्मा ने गौतम बुद्ध पर बनाई एक विशेष पेंटिंग और उनकी पुस्तक गुलज़ार साब को प्रस्तुत की।
गुलज़ार साब ने चौपाल परिवार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि चौपाल उनका परिवार है और ऑस्कार से ज्यादा खुशी इस बात से है कि उनका चौपाल जैसा परिवार है ।
पुष्पा जी ने धर्मवीर भारती जी का गुलज़ार साब पे कई वर्षों पहले लिखा एक लेख पढ़ कर प्रस्तुत किया।
और बारी आई गुलज़ार साब के काव्य-पाठ की, और अगले एक घंटे तक अपनी नज़्मों की बौछार से गुलज़ार साब ने श्रोताओं को सराबोर कर दिया। एक के बाद एक नज़्मों की बौछार चली जिनमें "खुदा", "कितनी गिरहें", "पूरे का पूरा आकाश", "चिपचिपे दूध से नहलाते", और "सिद्दार्थ" शामिल थी।
बारिश थमी भी ना थी कि रेखा भारद्वाज, जिनके गायन की बहुत पब्लिक डिमांड थी, ने "इश्क़ा इश्क़ा" से "तेरे इश्क़ में" और "तेरी रज़ा" सुना कर श्चौपाल के रसिकों को वाह वाह कहने पे मज़बूर कर दिया। कार्यक्रम के अंत में प्रस्तुति दी अनिल-सीमा सहगल की बेटी पार्वती ने, जिसने गुलज़ार साब की नज़्म को अपनी धुन के साथ प्रस्तुत किया। 5 घंटे के बाद भी किसी की इच्छा नहीं थी कि ये यादगार शाम कभी खत्म हो।
कुछ तस्वीरें पेश हैं (अशोक बिन्दल, मोहित कटारिया, भीम सिंह, अंशुल चौबे और प्रेरक व्यास के सहयोग से) :
महफ़िल की शुरुआत हुई गज़ल गायिका सीमा सहगल के गायन से जिन्होने गुलज़ार साब के शब्दों (यार जुलाहे) को धुन और आवाज़ में बांध कर प्रस्तुत किया। जावेद सिद्दिकी साब, अपनी बेटी लुबना, दामाद सलीम आरिफ़ और नातियों फ़राज़ और फ़ैज़ी(तहरीर में ईदगाह का हामिद) के साथ प्रस्तुत थे और तीनों पीढियों ने गुलज़ार साब को अपने अपने ढंग से प्रस्तुत किया.. जावेद साब ने गुलज़ार साब के बहुआयामी व्यक्तित्व के कुछ जाने और कुछ अनजाने पहलुओं का जिक्र किया। लुबना और सलीम की जोड़ी ने गुलज़ार साब द्वारा लिखित नाटक "खराशें" के कुछ अंश प्रस्तुत किये वहीं फ़ैज़ी ने बच्चों की कविता से बहुत तालियां बटोरी।
साहित्यकार विश्वनाथ सचदेव ने गुलज़ार साब के साथ बांटे गये मज़ेदार लम्हों की याद ताज़ा की । पूना से आये फ़िल्म इन्स्टीट्यूट FTII के निदेशक (धुनों की यात्रा के लेखक) पंकज राग ने अपनी किताब से कुछ अंश पढ़ कर सुनाये। किशोर कदम (सौमित्र) ने गुलज़ार साब की डायरी का काव्य पाठ किया तो शेखर सेन ने उनके कुछ फ़िल्मी गीत सुनाये । हास्य और व्यंग के एक वर्तमान हस्ताक्षर सुभाष काबरा ने अपने गुलज़ार साब पे केन्द्रित एक मज़ेदार व्यंग पाठ "हाय, हम गुलज़ार ना हुए" से चौपाल की सभा को एक नया माहौल दिया । फिर बारी थी स्टेज पे आने की भूपेन्द्र की और शुरुआत की उन्होने "थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा आसमां" के साथ और उनके गाते गाते शब्द भूलने का पुरुस्कार श्रोताओं को मिला एक अनूठी जुगलबन्दी के साथ, भुपेन्द्र और विशाल भारद्वाज के साथ... दर-असल भूपी जी को, विशाल श्रोताओं के बीच में से बार बार सही शब्द याद दिला रहे थे... गुलज़ार साब ने विशाल को स्टेज पे धकेल दिया और विशाल और भूपी जी ने "बादलों से काट काट कर" और "तेरे जाने से कुछ बदला नहीं" को जुगलबंदी में पेश कर सबका मज़ा दोगुना कर दिया।
इनके गायन के बाद वो पल आया, जिसके लिये ये महफ़िल सजाई गई। कार्यक्रम का संचालन कर रहे चौपाल के "एंकर" अतुल तिवारी ने गुलज़ार साब को सम्मानित करने के लिये मंच पे आमंत्रित किया पुष्पा भारती जी (स्व. धर्मवीर भारती की पत्नी) को । पुष्पा जी ने गुलज़ार साब को ट्रॉफ़ी प्रदान कर सम्मानित किया और चौपाल के इतिहास में एक यादगार पल की प्रविष्टी कर दी ।अशोक बिन्दल (जिनको ट्रॉफ़ी की खूबसूरती का श्रेय भी जाना चाहिये) ने गुलज़ार साब को अपनी कविता "ठहरी हुई आवाज़" समर्पित की। ट्रॉफ़ी पर पवन की ऑस्कर जीत की एक त्रिवेणी अंकित थी, जिसको मंच पे पढ़ा गया।

"ये सोना जो इतना चमक रहा है
अपनी किस्मत पे इतरा रहा है शायद!
तेरे नूर के आगे फिर भी फीका है।"
चित्रकार चरण शर्मा ने गौतम बुद्ध पर बनाई एक विशेष पेंटिंग और उनकी पुस्तक गुलज़ार साब को प्रस्तुत की।
गुलज़ार साब ने चौपाल परिवार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि चौपाल उनका परिवार है और ऑस्कार से ज्यादा खुशी इस बात से है कि उनका चौपाल जैसा परिवार है ।
पुष्पा जी ने धर्मवीर भारती जी का गुलज़ार साब पे कई वर्षों पहले लिखा एक लेख पढ़ कर प्रस्तुत किया।
और बारी आई गुलज़ार साब के काव्य-पाठ की, और अगले एक घंटे तक अपनी नज़्मों की बौछार से गुलज़ार साब ने श्रोताओं को सराबोर कर दिया। एक के बाद एक नज़्मों की बौछार चली जिनमें "खुदा", "कितनी गिरहें", "पूरे का पूरा आकाश", "चिपचिपे दूध से नहलाते", और "सिद्दार्थ" शामिल थी।बारिश थमी भी ना थी कि रेखा भारद्वाज, जिनके गायन की बहुत पब्लिक डिमांड थी, ने "इश्क़ा इश्क़ा" से "तेरे इश्क़ में" और "तेरी रज़ा" सुना कर श्चौपाल के रसिकों को वाह वाह कहने पे मज़बूर कर दिया। कार्यक्रम के अंत में प्रस्तुति दी अनिल-सीमा सहगल की बेटी पार्वती ने, जिसने गुलज़ार साब की नज़्म को अपनी धुन के साथ प्रस्तुत किया। 5 घंटे के बाद भी किसी की इच्छा नहीं थी कि ये यादगार शाम कभी खत्म हो।
कुछ तस्वीरें पेश हैं (अशोक बिन्दल, मोहित कटारिया, भीम सिंह, अंशुल चौबे और प्रेरक व्यास के सहयोग से) :
गुरुवार, मार्च 26, 2009
ऑस्कर पहुंचा बोस्किआना (Oscar Arrived at Boskyana)
गुलज़ार साब ऑस्कर समारोह में नहीं जा पाये मगर अब परम्परा के मुताबिक गुलज़ार साब की ऑस्कर ट्रॉफी सोमवार को उनके घर बोस्किआना पहुंच गई है ।

[साभार : मेघना गुलज़ार - ऑस्कर के आगमन पर ये खूबसूरत तस्वीर बिटिया मेघना के द्वारा ली गई है । शुक्रिया मेघना! इस लम्हे को हम सब के साथ बांटने के लिये]
बोस्किआना में पहले ही ट्रॉफियों का इक भरा पूरा परिवार, अपने इस नवीनतम सदस्य के लिये जगह बनाने में लग गया है!

[साभार : मेघना गुलज़ार - ऑस्कर के आगमन पर ये खूबसूरत तस्वीर बिटिया मेघना के द्वारा ली गई है । शुक्रिया मेघना! इस लम्हे को हम सब के साथ बांटने के लिये]
बोस्किआना में पहले ही ट्रॉफियों का इक भरा पूरा परिवार, अपने इस नवीनतम सदस्य के लिये जगह बनाने में लग गया है!
बुधवार, मार्च 11, 2009
होली के रंगों में एक रंग : Holi Mubaarak!
होली के रंगों में एक रंग और : गुलज़ार साब की एक त्रिवेणी जो आज के दैनिक भास्कर के होली विशेष में शामिल हुई है
साथ में एक और रंग बोनस में.. ईद के चाँद पर होली का रंग!

Source : Dainik Bhaskar, March 10, 2009, Page 17 link
ज़रा पैलेट सम्भालो रंगोबू का
मैं कैनवास आसमां का खोलता हूं
बनाओ फिर से सूरत आदमी की!
साथ में एक और रंग बोनस में.. ईद के चाँद पर होली का रंग!
जहां नुमा एक होटल है नां...
जहां नुमा के पीछे एक टी.वी. टॉवर है नां...
चाँद को उसके ऊपर चढ़ते देखा था कल!
होली का दिन था
मुंह पर सारे रंग लगे थे
थोड़ी देर में ऊपर चढ़ के
टांग पे टांग जमा के ऐसे बैठ गया था,
होली की खबरों में लोग उसे भी जैसे
अब टी.वी. पर देख रहे होंगे!!

Source : Dainik Bhaskar, March 10, 2009, Page 17 link
रविवार, मार्च 08, 2009
कितनी गिरहें खोली हैं मैने :[Gulzar saab's Poem on Women’s Day]
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर गुलज़ार साब की एक बेहद संवेदनशील रचना .. कितनी गिरहें खोली हैं मैने, कितनी गिरहें अब बाकी हैं.. ये रचना गुलज़ार साब ने सबसे पहले जयपुर में सुनाई थी.. और बाद में भुपेन्द्र-मिताली के साथ उनके एलबम "चाँद परोसा है" में मिताली की आवाज़ में प्रस्तुत हुई।
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
पांव मे पायल, बाहों में कंगन, गले मे हन्सली,
कमरबन्द, छल्ले और बिछुए
नाक कान छिदवाये गये
और ज़ेवर ज़ेवर कहते कहते
रीत रिवाज़ की रस्सियों से मैं जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
अब छिलने लगे हैं हाथ पांव,
और कितनी खराशें उभरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी रस्सियां उतरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
मैं पूछूं ज़रा, मैं पूछूं ज़रा
आँखों में शराब दिखी सबको, आकाश नहीं देखा कोई
सावन भादौ तो दिखे मगर, क्या दर्द नहीं देखा कोई
क्या दर्द नहीं देखा कोई
फ़न की झीनी सी चादर में
बुत छीले गये उरियानि के
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी
मेरे जिस्म पे फ़न की मश्क़ हुई
और आर्ट-कला कहते कहते
संगमरमर मे जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
बतलाए कोई, बतलाए कोई
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
पांव मे पायल, बाहों में कंगन, गले मे हन्सली,
कमरबन्द, छल्ले और बिछुए
नाक कान छिदवाये गये
और ज़ेवर ज़ेवर कहते कहते
रीत रिवाज़ की रस्सियों से मैं जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
अब छिलने लगे हैं हाथ पांव,
और कितनी खराशें उभरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी रस्सियां उतरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
मैं पूछूं ज़रा, मैं पूछूं ज़रा
आँखों में शराब दिखी सबको, आकाश नहीं देखा कोई
सावन भादौ तो दिखे मगर, क्या दर्द नहीं देखा कोई
क्या दर्द नहीं देखा कोई
फ़न की झीनी सी चादर में
बुत छीले गये उरियानि के
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी
मेरे जिस्म पे फ़न की मश्क़ हुई
और आर्ट-कला कहते कहते
संगमरमर मे जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
बतलाए कोई, बतलाए कोई
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
सोमवार, फ़रवरी 23, 2009
चख ले, हां चख ले, ये रात शहद है
"जय हो"
जीत का इससे बेहतर उदबोधन क्या होगा!
गुलज़ार साब की जीत, रहमान की जीत, गीत से जुड़े सभी लोगों की जीत, सभी सुनने वालॊं की जीत, हिन्दी फ़िल्म संगीत की जीत
हमें गर्व है गुलज़ार साब और रहमान पर..
आज गुलज़ार साब समारोह में नही थे, मगर ऑस्कर समारोह गुलज़ार हो गया!
जय हो!
जीत का इससे बेहतर उदबोधन क्या होगा!
गुलज़ार साब की जीत, रहमान की जीत, गीत से जुड़े सभी लोगों की जीत, सभी सुनने वालॊं की जीत, हिन्दी फ़िल्म संगीत की जीत
हमें गर्व है गुलज़ार साब और रहमान पर..
आज गुलज़ार साब समारोह में नही थे, मगर ऑस्कर समारोह गुलज़ार हो गया!
जय हो!
बुधवार, जनवरी 21, 2009
जयपुर हुआ गुलज़ार II
जयपुर प्रवास के दूसरे दिन गुलज़ार साब सुनने वाले काव्य रसिकों से रूबरू हुए एक अनूठे आयोजन में.. श्री पवन के वर्मा के साथ काव्य - जुगलबन्दी प्रस्तुत करते हुए. मौका था जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल का एक सत्र, जहां गुलज़ार साब और श्री वर्मा ने गुलज़ार साब की नज़्मों और त्रिवेणियों को, मिलकर हिन्दोस्तानी और अंग्रेज़ी मे प्रस्तुत कर सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया. सुनने के लिये खचाखच भरे हाल के अन्दर जितने श्रोता थे, उससे ज्यादा बाहर मज़बूरन टी.वी स्क्रीन्स पे मौज़ूद थे..
गुरुवार, जनवरी 01, 2009
जय हो! (Jai ho from Slumdog Millionaire)
जय हो!
जीत का जश्न है जय हो! (spoilers ahead... skip the para if you haven't seen the film)
झोपड़-पट्टी में पला-बढ़ा अनाथ जमाल सवाल दर सवाल फ़तेह हासिल कर के अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है. इस गेम शो में ज़िंदगी की किताब हर सवाल का जवाब हल करने में मदद कर रही है. बस एक सीढ़ी और बाकी है गेम शो को जीतने में, सिर्फ़ एक सवाल जो उसे दो करोड़ रु की ईनामी राशि का हक़दार बना देगा. मगर जमाल की आँखें कुछ और तलाश कर रही हैं. उसकी मंजिल कहीं और है, उसकी जीत का मक़सद कुछ और है... दो-ढाई करोड़ नहीं पर ढाई अक्षर प्रेम के.. जमाल की जीत होती है और ये गीत उसी जीत का हुंकारा है, जश्न की जयकार है.. रहमान की धुन इतनी जादुई है कि फ़िल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक फ़िल्म से बंधे रहते हैं... गुलज़ार साब के शब्दों में फ़िल्म की थीम बहुत खूबसूरती से उभर के आती है. जमाल की जीत के मक़सद को, और जीत के जश्न को इस गीत से बेहतर अन्त शायद नहीं मिलता.
आजा आजा जिन्दे, शामियाने के तले आजा
ज़री वाले नीले आसमान के तले जय हो!
जय हो!
रत्ती रत्ती सच्ची मैने जान गंवाई है
नच नच कोयलों पे रात बिताई है
अँखियों की नींद मैने फूंकों से उड़ा दी
गिन गिन तारे मैने उँगली जलाई है
आजा आजा ..... जय हो!
चख ले, चख ले
ये रात शहद है, चख ले
रख ले, हाँ दिल है
दिल आखरी हद है, रख ले
काला काला काजल तेरा
कोई काला जादू है ना
आजा आजा ..... जय हो!
कब से हाँ कब से
जो लब पे रुकी है.. कह दे
कह दे, हाँ कह दे
अब आँख झुकी है, कह दे
ऐसी ऐसी रोशन आँखें
रोशन दो दो हीरे हैं क्या?
आजा आजा ..... जय हो!
संजाय शेखर जो इन दिनों गुलज़ार साब के गीतों के अंग्रेजी अनुवाद पर काम कर रहे हैं, ने इस गीत का अंग्रेजी में खूबसूरत अनुवाद किया है.
come, come O Beloved
come step with me under this canopy
this azure canopy of a sky
filigreed with golden sunlight
come, I will tell you how
those dreary long nights—
without you—passed
each night— an ordeal
each night— a walk
on a bed of burning coals
look at the tips of my fingers:
singed, scorched from counting
the stars, but still
sleep was not to soothe my eyes
I had already blown it all away
believe you me—
those nights, I saw
life drain out of me
drop by drop
but tonight—
when you are with me—
this night is a pot of honey
come let's savour it
and keep this heart of mine
with you, for the heart is
the last frontier
look! I am under your spell
that black kohl in your eyes
has whipped up
a kind of black magic
come, say out those words
that you have always
catapulted back from your lips
look at you—
blushing, lowering your eyes
it is now or never
come, say it
but let's pause—
this night is fleet-footed
let's take a breather
let's prolong this night
but your eyes
with their brilliance of diamonds
has already lit up the night sky
filigreed it with the gold of the sun
come, come O Beloved
come become my life
come!
जीत का जश्न है जय हो! (spoilers ahead... skip the para if you haven't seen the film)
झोपड़-पट्टी में पला-बढ़ा अनाथ जमाल सवाल दर सवाल फ़तेह हासिल कर के अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है. इस गेम शो में ज़िंदगी की किताब हर सवाल का जवाब हल करने में मदद कर रही है. बस एक सीढ़ी और बाकी है गेम शो को जीतने में, सिर्फ़ एक सवाल जो उसे दो करोड़ रु की ईनामी राशि का हक़दार बना देगा. मगर जमाल की आँखें कुछ और तलाश कर रही हैं. उसकी मंजिल कहीं और है, उसकी जीत का मक़सद कुछ और है... दो-ढाई करोड़ नहीं पर ढाई अक्षर प्रेम के.. जमाल की जीत होती है और ये गीत उसी जीत का हुंकारा है, जश्न की जयकार है.. रहमान की धुन इतनी जादुई है कि फ़िल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक फ़िल्म से बंधे रहते हैं... गुलज़ार साब के शब्दों में फ़िल्म की थीम बहुत खूबसूरती से उभर के आती है. जमाल की जीत के मक़सद को, और जीत के जश्न को इस गीत से बेहतर अन्त शायद नहीं मिलता.
आजा आजा जिन्दे, शामियाने के तले आजा
ज़री वाले नीले आसमान के तले जय हो!
जय हो!
रत्ती रत्ती सच्ची मैने जान गंवाई है
नच नच कोयलों पे रात बिताई है
अँखियों की नींद मैने फूंकों से उड़ा दी
गिन गिन तारे मैने उँगली जलाई है
आजा आजा ..... जय हो!
चख ले, चख ले
ये रात शहद है, चख ले
रख ले, हाँ दिल है
दिल आखरी हद है, रख ले
फ़िल्म की थीम इन शब्दों में उभर के आती है... दिल से बड़ी कोई जीत नहीं, कोई ईनाम नहीं, कोई हद नहीं, कोई सौगात नहीं...
काला काला काजल तेरा
कोई काला जादू है ना
आजा आजा ..... जय हो!
कब से हाँ कब से
जो लब पे रुकी है.. कह दे
कह दे, हाँ कह दे
अब आँख झुकी है, कह दे
ऐसी ऐसी रोशन आँखें
रोशन दो दो हीरे हैं क्या?
आजा आजा ..... जय हो!
संजाय शेखर जो इन दिनों गुलज़ार साब के गीतों के अंग्रेजी अनुवाद पर काम कर रहे हैं, ने इस गीत का अंग्रेजी में खूबसूरत अनुवाद किया है.
come, come O Beloved
come step with me under this canopy
this azure canopy of a sky
filigreed with golden sunlight
come, I will tell you how
those dreary long nights—
without you—passed
each night— an ordeal
each night— a walk
on a bed of burning coals
look at the tips of my fingers:
singed, scorched from counting
the stars, but still
sleep was not to soothe my eyes
I had already blown it all away
believe you me—
those nights, I saw
life drain out of me
drop by drop
but tonight—
when you are with me—
this night is a pot of honey
come let's savour it
and keep this heart of mine
with you, for the heart is
the last frontier
look! I am under your spell
that black kohl in your eyes
has whipped up
a kind of black magic
come, say out those words
that you have always
catapulted back from your lips
look at you—
blushing, lowering your eyes
it is now or never
come, say it
but let's pause—
this night is fleet-footed
let's take a breather
let's prolong this night
but your eyes
with their brilliance of diamonds
has already lit up the night sky
filigreed it with the gold of the sun
come, come O Beloved
come become my life
come!
ताज़ा अपडेट (12.01.09) : ए. आर. रहमान फ़िल्म के संगीत के लिये प्रतिष्ठित गोल्डन ग्लोब अवार्ड से नवाज़े गये हैं. समारोह के दौरान जब भी स्लमडॉग मिलिनियर का नाम पुकारा गया हर ओर जय हो! का हुंकारा गूंजा... भारतीय फ़िल्म संगीत के लिये ये पुरस्कार एक बड़ी उपलब्धि है. ए. आर रहमान और गुलज़ार साब को बहुत बहुत बधाई!
ताज़ा अपडेट (22.01.09) : गुलज़ार साब और ए. आर. रहमान को जय हो! के लिये इस वर्ष के आस्कर पुरुस्कारों में सर्वश्रेषठ गीत के लिये नामांकित हुआ है. समारोह के दौरान रहमान इस गीत को लाईव प्रस्तुत भी करेंगे. ए. आर रहमान और गुलज़ार साब को बहुत बहुत बधाई!
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