कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के
लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..
ख़याल होता है, गोर्की है!
पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
जो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबें
डिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...
या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई, चिपक गया है
समय पलटता नहीं वहां से
कहानी आगे बढ़ती नहीं है... और कहानी रुकी हुई है।
ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी।
हथेली पे लेके दिन की फक्की
मैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर
ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता
ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों का
जस भरी रात गर्मियों की
- गुलज़ार
[नया ज्ञानोदय [अप्रैल २०१०] से साभार]
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रविवार, मई 23, 2010
गुरुवार, अगस्त 27, 2009
रीढ़ - Reedh - One of the most inspiring poems. Kusumagraj Translated by Gulzar
Translation of Kusumagraj's one of the most inspiring poems (Reedh - Original Title Kanaa in Marathi). Very Simply told but exceptional in impact.. Conversation of a student with his old time teacher after long time.. (for roman, scroll down)
रीढ़
"सर, मुझे पहचाना क्या?"
बारिश में कोई आ गया
कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुए
पल को बैठा, फिर हँसा, और बोला ऊपर देखकर
"गंगा मैया आई थीं, मेहमान होकर
कुटिया में रह कर गईं!
माइके आई हुई लड़की की मानिन्द
चारों दीवारों पर नाची
खाली हाथ अब जाती कैसे?
खैर से, पत्नी बची है
दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझा,
जो था, नहीं था, सब गया!
"’प्रसाद में पलकों के नीचे चार क़तरे रख गई है पानी के!
मेरी औरत और मैं, सर, लड़ रहे हैं
मिट्टी कीचड़ फेंक कर,
दीवार उठा कर आ रहा हूं!"
जेब की जानिब गया था हाथ, कि हँस कर उठा वो...
’न न’, न पैसे नहीं सर,
यूंही अकेला लग रहा था
घर तो टूटा, रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी...
हाथ रखिये पीठ पर और इतना कहिये कि लड़ो... बस!"
Reedh (Original Title Kanaa)
Original Marathi Poem : Kusumagraj
Translated by Gulzar
Reedh :
"Sir, Mujhe Pehchaana kya?"
Baarish me koi aa gaya
kapade the muchade hue
aur baal sab bheege hue
pal ko baitha, phir hansaa aur bola oopar dekh kar
"gangaa maiyya aaI thi, mehmaan hokar
kutiyaa me rah ke gaI|
maaike aai huee ladaki ki maanind
chaaron deewaro par naachi
khaali haath ab jaato kaise?
khair se, patni bachi hai
deewaar chooraa ho gaI, chulha bujha
jo tha, nahin tha, sab gaya!
"prasaad me palako ke neeche chaar katare rakh gaI hai paani ke
meri aurat aur mai.n laD rahe hai
mitti keechad phenk kar
deewaar uthaa kar aa rahaa hoon!"
jeb ki jaanib gayaa tha haath, ki hans kar uthaa wo...
'na, na, na paise nahi.n sir,
yunhi akela lag rahaa tha..
ghar to TuTa, reedh ki haddi nahi.n TuTi meri
haath rakhiye peeth par, aur itna kahiye ki
laDo...bas!...
रीढ़
"सर, मुझे पहचाना क्या?"
बारिश में कोई आ गया
कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुए
पल को बैठा, फिर हँसा, और बोला ऊपर देखकर
"गंगा मैया आई थीं, मेहमान होकर
कुटिया में रह कर गईं!
माइके आई हुई लड़की की मानिन्द
चारों दीवारों पर नाची
खाली हाथ अब जाती कैसे?
खैर से, पत्नी बची है
दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझा,
जो था, नहीं था, सब गया!
"’प्रसाद में पलकों के नीचे चार क़तरे रख गई है पानी के!
मेरी औरत और मैं, सर, लड़ रहे हैं
मिट्टी कीचड़ फेंक कर,
दीवार उठा कर आ रहा हूं!"
जेब की जानिब गया था हाथ, कि हँस कर उठा वो...
’न न’, न पैसे नहीं सर,
यूंही अकेला लग रहा था
घर तो टूटा, रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी...
हाथ रखिये पीठ पर और इतना कहिये कि लड़ो... बस!"
Reedh (Original Title Kanaa)
Original Marathi Poem : Kusumagraj
Translated by Gulzar
Reedh :
"Sir, Mujhe Pehchaana kya?"
Baarish me koi aa gaya
kapade the muchade hue
aur baal sab bheege hue
pal ko baitha, phir hansaa aur bola oopar dekh kar
"gangaa maiyya aaI thi, mehmaan hokar
kutiyaa me rah ke gaI|
maaike aai huee ladaki ki maanind
chaaron deewaro par naachi
khaali haath ab jaato kaise?
khair se, patni bachi hai
deewaar chooraa ho gaI, chulha bujha
jo tha, nahin tha, sab gaya!
"prasaad me palako ke neeche chaar katare rakh gaI hai paani ke
meri aurat aur mai.n laD rahe hai
mitti keechad phenk kar
deewaar uthaa kar aa rahaa hoon!"
jeb ki jaanib gayaa tha haath, ki hans kar uthaa wo...
'na, na, na paise nahi.n sir,
yunhi akela lag rahaa tha..
ghar to TuTa, reedh ki haddi nahi.n TuTi meri
haath rakhiye peeth par, aur itna kahiye ki
laDo...bas!...
रविवार, मार्च 08, 2009
कितनी गिरहें खोली हैं मैने :[Gulzar saab's Poem on Women’s Day]
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर गुलज़ार साब की एक बेहद संवेदनशील रचना .. कितनी गिरहें खोली हैं मैने, कितनी गिरहें अब बाकी हैं.. ये रचना गुलज़ार साब ने सबसे पहले जयपुर में सुनाई थी.. और बाद में भुपेन्द्र-मिताली के साथ उनके एलबम "चाँद परोसा है" में मिताली की आवाज़ में प्रस्तुत हुई।
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
पांव मे पायल, बाहों में कंगन, गले मे हन्सली,
कमरबन्द, छल्ले और बिछुए
नाक कान छिदवाये गये
और ज़ेवर ज़ेवर कहते कहते
रीत रिवाज़ की रस्सियों से मैं जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
अब छिलने लगे हैं हाथ पांव,
और कितनी खराशें उभरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी रस्सियां उतरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
मैं पूछूं ज़रा, मैं पूछूं ज़रा
आँखों में शराब दिखी सबको, आकाश नहीं देखा कोई
सावन भादौ तो दिखे मगर, क्या दर्द नहीं देखा कोई
क्या दर्द नहीं देखा कोई
फ़न की झीनी सी चादर में
बुत छीले गये उरियानि के
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी
मेरे जिस्म पे फ़न की मश्क़ हुई
और आर्ट-कला कहते कहते
संगमरमर मे जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
बतलाए कोई, बतलाए कोई
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
पांव मे पायल, बाहों में कंगन, गले मे हन्सली,
कमरबन्द, छल्ले और बिछुए
नाक कान छिदवाये गये
और ज़ेवर ज़ेवर कहते कहते
रीत रिवाज़ की रस्सियों से मैं जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
अब छिलने लगे हैं हाथ पांव,
और कितनी खराशें उभरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी रस्सियां उतरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
मैं पूछूं ज़रा, मैं पूछूं ज़रा
आँखों में शराब दिखी सबको, आकाश नहीं देखा कोई
सावन भादौ तो दिखे मगर, क्या दर्द नहीं देखा कोई
क्या दर्द नहीं देखा कोई
फ़न की झीनी सी चादर में
बुत छीले गये उरियानि के
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी
मेरे जिस्म पे फ़न की मश्क़ हुई
और आर्ट-कला कहते कहते
संगमरमर मे जकड़ी गयी
उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...
बतलाए कोई, बतलाए कोई
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं
बुधवार, अप्रैल 16, 2008
खर्ची
मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोइ छीन लेता है,
झपट लेता है अण्टी से!
कभी खीसे से गिर पढ़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी मैं खोटा समझ के भूल जाता हूं!
गिरेबान से पकड़ के मांगने वाले भी मिलते हैं
"तेरी गुज़री हुई पुश्तों का कर्ज़ा है,
तुझे किश्तें चुकानी हैं--"
ज़बर्दस्ती कोई गिरवी भी रख लेता है, ये कह कर,
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिये रख ले,
बक़ाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन, इक बार मैं
अपने लिये रख लूं
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन, बस खर्च करने कि तमन्ना है!!
मगर हर रोज़ कोइ छीन लेता है,
झपट लेता है अण्टी से!
कभी खीसे से गिर पढ़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी मैं खोटा समझ के भूल जाता हूं!
गिरेबान से पकड़ के मांगने वाले भी मिलते हैं
"तेरी गुज़री हुई पुश्तों का कर्ज़ा है,
तुझे किश्तें चुकानी हैं--"
ज़बर्दस्ती कोई गिरवी भी रख लेता है, ये कह कर,
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिये रख ले,
बक़ाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन, इक बार मैं
अपने लिये रख लूं
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन, बस खर्च करने कि तमन्ना है!!
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