सोमवार, दिसंबर 08, 2008

Musafir Ka Safar [Main Thak Gaya Hoon...Bahut Raat Huee]

A journey started with the “Parichay” of two legends Gulzar and Pancham.. One night (sometime in early 70s) that got them together in Pancham’s car and sets off to a journey and the night gave birth to the brilliant “Musafir hoon yaaron”.. Well most of the gulzar-pancham fans know about the story of that night.. us raat ki kahaani phir kabhi.. The journey continued for many many years and the duo created many many milestones in the journey together.


The Milestone I am standing tonight at, is a gem of a song “Main thak gaya hoon mujhe sone do” from the film “Musafir” in early 80s… Another legendary musafir “Kishore da” teamed up in building this milestone Musafir was directed by Dr Jabbar Patel (Jait re Jait and Subah) featured Naseeruddin Shah, Rekha, Pankaj Kapoor, MunMun Sen in the main cast..


“Main thak gaya hoon” is very comprehensive song as far as the picturisation is concern…and it comes at a very important time in the film… If you’ve seen Vijay Tendulkar’s play “Panchhi aise aate hain”… or the film “Thoda sa roomani ho jaaye” or even the Sanjay Dutt-Urmila’s flick “Khoobsurat”.. The storyline of Musafir is some-what on the similar lines… where a criminal [not in all the instances] (rather a suspect) kind of personality reaches an unknown place [running away from his past] and finds a family to stay with…. We find the the members of the family lacks confidence in life [specifically our heroine, in all three instances]… The hero helps them to change their attitude towards life and build confidence…


In Musafir, the hero is Naseeruddin Shah (Man on the run) and the heroine Rekha [a village girl from south india]…. The song comes at a very important place where Naseer is running away [after killing his bewafa wife Munmun sen]… He wants to run away from his past and reach a place where he can start afresh… The song starts Naseer’s journey to an unknown destination…


Just after the murder, Naseer gets into a Taxi, the Taxiwala asks “Kia sahab, kahan le chalun”.. Naseer replies “Jahan tum le chalo”.. The song starts in night, Naseer traveling in Train… and in background Kishore’s voice starts “Ho bahut raat huee.. thak gaya hoon mujh sone do.. ho bahut raat huee, chaand se keh do utar jaaye bhut baat huee”.. The interlude after the mukhda carries on in the daylight and Naseer is shown traveling in the truck…. during the stanza he gets down and walks thru the landscapes in the heat of the day… “Dhoop se keh do utar jaaye bahut baat huee”…


The next stanza begins with some place in Kerla… sunset time… Naseer is shown traveling in a boat… thats where Pancham does his usual Maanjhi act… [Malaiyya chalo dheere dheere, which is very close to Rehman's maanjhi act of "Dil hai chhota sa".. a south indianish maanjhi pattern by Pancham.. infact the whole film had some beautiful south indianish background pieces by Pancham].. Gulzar saab comes this time with “Waqt se keh do gujar jaaye.. bahut baat huee”.. slowly this sunset turns to night with “Mein thak gaya  hoon”…and the song ends with the morning where naseer is shown sleeping on a sea shore.. [some village in South India]..


From this point to the end, the film lives on in this village only (Naseer meeting Rekha’s family.. The family is unable to find a suitable match for Rekha)… [a sidenote for Pankaj Kapoor's fans on this forum, this was his first prominent screen appearance...]  Coming back to the song, The Singing, Lyrics, Composition and Picturisation every aspect of the song is just perfect…

Aashiyane ke liye chaar tinake bhi the
Aasre raat ke aur din ke bhi the
Dhoondhte the jise wo zara si zameen
Aasmaan ke tale kho gayee hi kahin…

The song travels from Train to Truck to Boat, from Railway track to Road to River to Sea.. from night to morning to day to evening.. One of the best traveling song of our times? :)

Hats off to the Team of Gulzar-Pancham-Kishore…

Remember another great traveling song by the same team “Raah pe rahate hain…” ? Kishore da and Pancham da “khush raho ahale watan, ham to safar karate hain” gaa kar alvida kah gaye….gulzar saab aaj is safar mein akele khade hain..


Keep listening the immortal melodies…
Song : Thak gayaa hoon, bahut raat huee
Film : Musafir (1984)
Music : RD Burman
Lyricist : Gulzar
Singers : Kishore Kumar, Pancham

Kishore:

गीत : थक गया हूं, बहुत रात हुई
फ़िल्म : मुसफ़िर (१९८४)
संगीतकार : आर.डी. बर्मन
गीतकार : गुलज़ार
गायक : किशोर कुमार, आर.डी. बर्मन


हो बहुत रात हुई..
थक गया हूं, मुझे सोने दो
हो बहुत रात हुई

चांद से कह दो उतर जाये
बहुत बात हुई -२

थक गया हूं....रात हुई

आशियां के लिये चार तिनके भी थे
आसरे रात के और दिन के भी थे
ढूंढते थे जिसे, वो ज़रा सी ज़मीं
आसमां के तले खो गयी है कहीं
धूप से कह दो उतर जाये, बहुत बात हुई

मैं थक....रात हुई

[ओ मलैय्या, चलो धीरे धीरे (पंचम की आवाज़ में)]

याद आता नहीं अब कोई नाम से
सब घरों के दिये बुझ गये शाम से
वक़्त से कह दो गुज़र जाये, बहुत बात हुई

मैं थक....रात हुई

ज़िन्दगी के सभी रास्ते सर्द हैं
अजनबी रात के अजनबी दर्द हैं

याद से कह दो गुज़र जाये, बहुत बात हुई

मैं थक गया हूं, मुझे सोने दो, बहुत रात हुई

[ओ मलैय्या, चलो धीरे धीरे  fades out in pancham's voice "O malaiyya chalo dheere dheere"]

So thats all folks for tonight…. Main jaata hoon, mujh sone do, bahut raat huee…

[Originally published on passionforcinema.com]

गुरुवार, दिसंबर 04, 2008

चुनाव (elections)

राजस्थान में आज चुनाव का दिन... वोट पड़ रहे हैं नयी सरकार के लिये.. पर्ची इस बार भी पहुंची है और याद दिला रही है गुलज़ार साब की एक त्रिवेणी की



पर्चियां बंट रही हैं गलियों में
अपने क़ातिल का इन्तेख़ाब करो

वक़्त ये सख़्त है चुनाव का !



Parchiyaan bat rahi hain galiyon mein
Apne qaatil ka intekhaab karo
Waqt ye sakht hai chunaav ka

सोमवार, नवंबर 10, 2008

बुढ़िया रे!

हाल ही में कोवलम (केरल) में पहला कोवलम साहित्यिक समारोह आयोजित किया गया. समारोह में गुलज़ार साब ने भी शिरक़त की.. और अपनी नज़्मों से सुनने वालों की आखॊं और अन्तर्मन दोनो को भिगो दिया... खासकर उनकी नज़्म बुढिया रे से..


बुढ़िया, तेरे साथ तो मैंने,

जीने की हर शह बाँटी है!


दाना पानी, कपड़ा लत्ता, नींदें और जगराते सारे,

औलादों के जनने से बसने तक, और बिछड़ने तक!

उम्र का हर हिस्सा बाँटा है ----


तेरे साथ जुदाई बाँटी, रूठ, सुलह, तन्हाई भी,

सारी कारस्तानियाँ बाँटी, झूठ भी और सच भी,

मेरे दर्द सहे हैं तूने,

तेरी सारी पीड़ें मेरे पोरों में से गुज़री हैं,


साथ जिये हैं ----

साथ मरें ये कैसे मुमकिन हो सकता है ?


दोनों में से एक को इक दिन,

दूजे को शम्शान पे छोड़ के,

तन्हा वापिस लौटना होगा ।

बुढिया रे!


(शुक्रिया मोहित, इस नज़्म के कम्प्यूटरीकरण के लिये)

रविवार, सितंबर 07, 2008

"विज्ञान की रंगोली, साहित्य के झरोखे से" : Gulzar saab at IISc

गये हफ़्ते गुलज़ार साब पहुंचे भारतीय विज्ञान केन्द्र, बंगलौर, (I.I.Sc.) संस्था के शताब्दी समारोह में भाग लेने के लिये.. उनकी चर्चा का विषय बड़ा अनूठा था, "विज्ञान की रंगोली, साहित्य के झरोखे से".. संस्था से शोध कर रहे श्रीराम यादव ने कार्यक्रम का बयान कुछ इस तरह से दिया है..

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"विज्ञान की रंगोली, साहित्य के झरोखे से"

दोस्तो,

ये एक अनोखा अनुभव था, जब हम सभी ने गुलज़ार साब का वैज्ञानिक रूप देखा. ये वक़्त था जब गुलज़ार साब ने IISc के शताब्दी लैक्चर सीरीज़ में एक साहित्यकार के हैसियत से अपना वैज्ञानिक मूड सामने रखा. अभी तक तो हम उनकी शायरी में कुछ कोस्मोस का ज़िक्र होते हुए देखा किये थे, यह पहला मौक़ा था जब एक शायर के नज़रिये से पूरे का पूरा क़ायनात उनके ज़िक्र में देखा.

28 अगस्त, 2008, शाम 4 बजे, जब IISc के लोगों से भरा जे. एन. टाटा सभागार, गुलज़ार साब का इन्तज़ार कर रहा था. सभी की निगाहें उस दरवाजे की तरफ़ थीं, जहां एक पर्दा लगा हुआ था. जैसे ही गुलज़ार साब ने स्टेज पर क़दम रखा, पूरे IISc परिवार ने अपनी सीट पे खड़े हो कर तालियों से स्वागत किया. इन्जीनियरिंग विभाग के डीन, प्रो. बिस्वास, और आधिकारिक भाषा विभाग के मुख्य अधिकारी, प्रो. रूद्र प्रताप ने गुलज़ार साब का अभिवादन किया. आखिर वो लम्हा आया जिसका इन्तज़ार पिछले ६ महिनों से था. जब गुलज़ार साब माईक पे सबके सम्मुख प्रस्तुत हुए. एक बार फिर से पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.


गुलज़ार साब ने अभिवादन स्वीकार किया और थोड़ा अपने पढ़ाई के दिनों का ज़िक्र करते हुए अपना लैक्चर शुरु किया.

"जब मैं विज्ञान और कला के चयन की जद्दो-ज़हद में फ़ंसा तो विज्ञान इसलिये नहीं लिया क्योंकि उसमें बहुत मेहनत करनी पड़ती है, हार्ड वर्क करना पड़ता है और मैं हार्डली वर्क करता था". "पढ़ाई लिखाई में जो कमी रह गयी थी वो अब लिखकर पूर कर रहा हूं और खड़ा रहने की आदत तो बचपन में टीचर्स ने ही डाल दी थी. बाद में जब कोस्मोस की स्टडी की तो विज्ञान ना पढ़ने का थोड़ा दुख हुआ."


जब हम वैज्ञानिकों के सामने विज्ञान की बिग-बैन्ग थ्योरी को अपने नजरिये से पेश किया तो पूरा सभागार खुश और हैरान हो गया. लाइफ़ के ईवोल्युशन, सैल कैसे बना और कैन्सर क्या होता है गुलज़ार साब ने बहुत ही खूबसूरत अन्दाज़ में बयां किया.

अपनी नज़्म 2085 में बड़ी एनेर्जी और छोटी एनेर्जी के गुफ़्तगु को क्या खूब बयां किया उन्होने.
उनके अनुसार, वैज्ञानिक और साहित्यकार काफी सिमिलर होते हैं, वैज्ञानिक को फ़ैक्ट्स सर्च करके लिखना पड़ता है और साहित्यकार को महसूस करके.

दोनो के अन्तर पर एक ही नज़्म के दो हिस्से बयां किये

वैज्ञानिक:

"मेरी ख़ुदी को मारना चाहा तुमने चंद चमत्कारों से
और मेरे एक प्यादे ने चलते चलते
तेरा चांद का मोहरा मार लिया"

शायर:
"मौत को शह देकर तुमने समझा था अब तो मात हुई
मैने जिस्म का खोल उतार कर सौंप दिया, और रूह बचा ली"

"पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी"
[पूरी नज़्म : http://groups.yahoo.com/group/gulzarfans/message/5456]

बारी थी एक और मज़ेदार अन्तर की.. उन्होने सभागार मे उपस्थित लोगों से पूछा चांद पर पहला क़दम किसने रखा था.. सब के सब के पास जवाब था "नील आर्मस्ट्रांग"

फिर पूछा "दूसरा शख्स कौन था"
इस बार जवाब कुछ लोगों तक सिमट गया "एडविन एल्ड्रिन"





दलील कि दोनो वैज्ञानिक एक ही साथ पहुंचे, केवल एक क़दम का फ़ासला था, फिर भी दूसरे का नाम कम लोग जानते हैं.. एक और शख्स था जो राकेट में ही रहा, नीचे नहीं उतरा.. कौन था वो.. कभी आपने उसके बारे में सोचा? उसके दिल पे क्या गुजरी होगी. क्या उसकी उपलब्धि किसी से कम थी?.. शायर उसके बारे में भी सोचता है, जिसे वैज्ञानिक अहमियत नहीं देते.. उनको फ़ैक्ट्स चाहिये मगर कवि उन फ़ैक्ट्स पे नहीं जीता, बल्कि उनकी शैडोज तक भी पहुंचता है.


उनकी इस मज़ेदार चर्चा के बाद बारी आयी रूबरू सवाल जवाब की.. बज़्म.ए.गुलज़ार में
इस प्रोग्राम का स्वरूप बहुत ही खुला रखा गया था.. कुछ मज़ेदार सवाल जवाब पेश हैं

स: गुलज़ार साब, दिल और दिमाग़ में शायर दिल को ज्यादा अहमियत देता है जबकि भावनयें दिमाग़ में पैदा होती हैं और उनका दिल से कोई रिश्ता नहीं?

ज: जब दिमग काम करना बंद कर दे तो भी इन्सान को मुर्द क़रार नहीं दिया जाता जबकि दिल के रुकते ही उसे मुर्दा ठहरा दिया जाता है

स: कभी आपकी ज़िन्दगी में दिल-ओ-दिमाग़ में तक़रार हो तो कौन जीतता है?

ज: शेर,
"मैं दिल को और दिल मुझे समझाता है
यहां कोई किसी की नहीं सुनता"


स: अगर आप शायर नहीं होते तो क्या होते?
ज: मेरी पत्नी कहती है, अगर तुम शायर नहीं होते तो बहुत ही आर्डिनेरी इन्सान होते

स: आप इतनी गहराई से कैसे लिख लेते हैं?
ज: गहराई अपने अनुसार ही डिफ़ाइन करना होता है, समुन्दर या पहाड़

स: उर्दू जबान खत्म हो रही है?
ज: कौन कहता है मुझे तो बढ़ती नज़र आ रहि है. पार्टीशन के बाद उर्दू को एक मुल्क़ (पाकिस्तान) मिल गया. कभी आपने सिन्धी के बारे में सोचा, जिनका मुल्क़ भी छिन गया और जुबान भी.

"मैं जितनी भी ज़बानें जानता था, वो सारी आज़माईं हैं
ख़ुदा ने एक भी समझी नहीं अब तक
.........
.........
"पढ़ा लिखा अगर होता खुदा अपना
न होती गुफ़्तगु तो कम से कम
चिट्ठी का आना जाना तो लगा रहता"



स: फ़िल्में समाज को कैसे अफ़ैक्ट करती हैं? जो घटनायें दिखयी जाती हैं...


आ. फ़िल्म समाज को उतन अफ़्फ़ैक्ट नहीं करतीं जितना समाज फ़िल्म को अफ़ैक्ट करता है. फ़िल्म तो बस समाज की ही बातें पेश करती हैं, थोड़ा सा वोल्यूम बढा कर. कुछ घटनायें असली ज़िन्दगी में इतनी डरावनी होती हैं कि फ़िल्म पे भी उतारा नहीं जा सकता. क़श्मीर की गली आप से रात के सन्नाटे में गुज़रें, कोई नहीं हो, फिर भी आपकी जो हालत होगी उसे फ़िल्म में नहीं उतारा जा सकता. (फ़िल्म में कम से कम बैक ग्राऊण्ड म्युसिक होता है)

"मकान की ऊपरी मंज़िल पर
अब कोई नहीं रहता,
कमरे बन्द हैं कब से.
जो चौडी सीढियां उन तक पहुंचती थी,
वो अब ऊपर नहीं जाती.
मकान की ऊपरी मंज़िल पर
अब कोई नहीं रहता
...............
उसी मन्ज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थी
जहां पुरखों की तस्वीरें टंगी थी
मैं सीधा करता रहता था
हवा फ़िर टेढा कर जाती
बहू को मून्छो वाले सारे पुरखे
क्रिएचर लगते थे,
मेरे बच्चों ने आखिर उनको कीलों से उतारा
पुराने न्यूज़ पेपर में
महफ़ूज़ करके रख दिया था,
मेरा एक भांजा ले जाता है
फ़िल्मों में कभी सेट पर लगाता है
किराया मिलता है उनसे.
..............
मेरी मंज़िल पे मेरे सामने मेहमानखाना है
मेरे पोते कभी अमरिका से आयें तो रुकते हैं
अलग साइज़ में आते हैं,
जितनी बार आते है
खुदा जाने वो ही आते हैं या
हर बार कोई और आता है
.................
"
[पूरी नज़्म : http://gulzars.blogspot.com/2007/08/gulzar-at-world-hindi-conference.html]


स: "मैं शायर तो नहीं, मगर तुमको देखा तो शायरी आ गयी" में आप कितना विश्वास करते हैं?
ज: ये तो आपके विश्वस की बात है, मेरे लिये तो काम्प्लिमेंट हो, मगर और कोई आपसे खफ़ा हो जयेगा.

स: नये गीतकरों में आप किसको अपनी विरासत सौंपना चाहेंगे
ज: अभी तो मैं हूं.:)






स: आर्ट्स लोग इसलिये आप्ट नहीं करते, क्योंकि सोशल प्रेशर और स्टेटस
ज: ये आप्शन की बात है, अगर आप्शन है तो पथ्हर की हवेली हो, शीशे के घरोन्दा और तिनकों का नशेमन.

स: आप अपने सोन्ग्स में इतना वेरिएशन कहां से लाते हैं
ज: फ़िल्म के स्क्रिप्ट से, जो किरदार जो जुबान बोलता है, गीत वैसे हि लिखे जाते हैं अब गैन्गस्टर है यही कहेग "गोली मार भेजे में" य ओंकारा में जो पश्चिम यू पी के किरदर थे वो "बिड़ी जलाइलो या नमक इश्क़ का" की भाषा

इसके अलावा बहुत से सवाल उठे, खूबसूरत जवाबों के साथ लौटाये.. अभी इस पल सभी का ज़िक्र करन मुश्किल होगा.. 3.5 घन्टे कैसे बीते पता ही नहीं चला.. बाद में गुलज़ार साब ने बैठ कर, बड़े इत्मिनान से हर शख्श को औटोग्राफ दिया, सबको फोटो का मौका मिला, और सबसे बातें की.हर शख्श ने उन्हें छूकर महसूस किया. गुलज़ार साब IISc के इतिहास में एक विशेष व्यक्तित्व और साहित्यकार की हैसियत से अपना नाम दर्ज़ कर चुके हैं.


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शुक्रिया श्रीराम इस खूबसूरत शाम के बयां के लिये

सोमवार, अगस्त 18, 2008

गुलज़ार साब! : जन्म दिन मुबारक़

गुलज़ार साब के ७४वें जन्म दिन पर उनके सभी चाहने वालों की ओर से बहुत बहुत मुबारक़बाद!

अगर आप अपनी शुभकामनाएं सीधे गुलज़ार साब तक पहुंचाना चाहते हैं तो यहां पर क्लिक करें

मोरा गोरा अंग लेई ले....- गुलज़ार, एक परिचय

आज गुलज़ार साब का जन्मदिन है, और हिन्द युग्म पर संजीव सारथी ने जन्म दिन की बधाई पेश की है

http://podcast.hindyugm.com/2008/08/blog-post_18.html

सोमवार, अगस्त 11, 2008

शहरयार गुलज़ार : शहरनामे

शहरयार : गुलज़ार
नया ज्ञानोदय, जून २००८


भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय के पिछले अंक (जून २००८) में गुलज़ार साब की कलम ने पांच शहरों की तस्वीरें उकेरी हैं, कविताओं के माध्यम से शहरों के चरित्र को पेश किया है..

प्रस्तुत हैं शहरनामे के कुछ अंश..
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बम्बई



बड़ी लम्बी सी मछली की तरह लेटी हुई पानी में ये नगरी
कि सर पानी में और पांव जमीं पर हैं
समन्दर छोड़ती है , ना समन्दर में उतरती है
ये नगरी बम्बई की..



....


यहां जीना भी जादू है
यहां पर ख्वाब भी टांगों पे चलते हैं
उमंगें फूटती हैं, जिस तरह पानी मे रक्खे मूंग के दाने
चटखते हैं तो जीभें उगने लगती हैं

यहां दिल खर्च हो जाते हैं अक्सर कुछ नहीं बचता

.....


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मद्रास (चेन्नई)



शहर ये बुजुर्ग लगता है
फ़ैलने लगा है अब
जैसे बूढ़े लोगों का पेट बढ़ने लगता है

ज़बां के ज़ायके वही
लिबास के सलीके भी....

.....

ख़ुशकी बढ़ गयी है जिस्म पर, ’कावेरी’ सूखी रहती है

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कोलकता


कभी देखा है बिल्डिंग में,
किसी सीढ़ी के नीचे
जहां मीटर लगे रहते हैं बिजली के
पुराने जंग आलूदा...
खुले ढक्कन के नीचे पान खाये मैले दांतों की तरह
कुछ फ़्यूज़ रक्खे हैं
...
बेहया बदमाश लड़के की तरह वो
खिलखिला के हंसता रहता है!

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दिल्ली - पुरानी दिल्ली की दोपहर


लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
चारपाई बुनने वाला जब
घंटा घर वाले नुक्कड़ से, कान पे हाथ रख कर
इक हांक लगता था - ’चार पाई. बनवा लो...’
खसखस कि टट्यों में सोये लोग अन्दाज़ा लगा लेते थे.. डेढ़ बजा है..
दो बजते बजते जामुन वाला गुजरेगा

’जामुन.. ठन्डे.. काले जामुन’


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न्यूयार्क

तुम्हारे शहर में ए दोस्त
क्यूं कर च्युंटियों के घर नहीं हैं
कहीं भी चीटियां नहीं देखी मैने

अगरचे फ़र्श पे चीनी भी डाली
पर कोइ चीटीं नज़र नहीं आयी
हमारे गांव के घर में तो आटा डालते हैं, गर
कोइ क़तार उनकी नज़र आये

....


तुम्हारे शहर में गरचे..
बहुत सब्ज़ा है, कितने खूबसूरत पेड़ हैं
पौधे हैं, फूलों से भरे हैं

कोई भंवरा मगर देखा नहीं भंवराये उन पर

......


मेरा गांव बहुत पिछड़ा हुआ है
मेरे आंगन के बरगद पर
सुबह कितनी तरह के पंछी आते हैं
वे नालायक, वहीं खाते हैं दाना
और वहीं पर बीट करते हैं


तुम्हारे शहर में लेकिन
हर इक बिल्डिंग, इमारत खूबसूरत है, बुलन्द है
बहुत ही खूबसूरत लोग मिलते हैं

मगर ए दोस्त जाने क्यों..
सभी तन्हा से लगते हैं
तुम्हारे शहर में कुछ रोज़ रह लूं
तो बड़ा सुनसान लगता है..
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शहरयार : गुलज़ार
नया ज्ञानोदय, जून २००८
(भारतीय ज्ञानपीठ)
jnanpith.net

बुधवार, अप्रैल 16, 2008

खर्ची

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोइ छीन लेता है,
झपट लेता है अण्टी से!

कभी खीसे से गिर पढ़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी मैं खोटा समझ के भूल जाता हूं!


गिरेबान से पकड़ के मांगने वाले भी मिलते हैं
"तेरी गुज़री हुई पुश्तों का कर्ज़ा है,
तुझे किश्तें चुकानी हैं--"

ज़बर्दस्ती कोई गिरवी भी रख लेता है, ये कह कर,
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिये रख ले,
बक़ाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा

बड़ी हसरत है पूरा एक दिन, इक बार मैं
अपने लिये रख लूं

तुम्हारे साथ पूरा एक दिन, बस खर्च करने कि तमन्ना है!!

रविवार, अक्टूबर 07, 2007

नो स्मोकिंग : फिर तलब, है तलब [No Smoking : Music Review]

[वैधानिक चेतावनी : नो स्मोकिंग का संगीत स्वास्थ्य के लिये हानिकारक साबित हो सकता है.. बार बार की रिवाईंडिंग आपकी उंगलियों को नुकसान पहुंचा सकती है.. और संगीत का हर कश आपको इस एल्बम का तलबगार बना सकता है ]


बीड़ी की आग अभी तक बुझी नहीं थी, कि गुलज़ार साब विशाल के साथ सिगरेट लेकर हाज़िर हो गये हैं... नो स्मोकिंग का संगीत आ गया है.. हालांकि हर गीत सिगरेट विरोधी स्वर लिये हुए है मगर यकीन मानिये इसके संगीत के एक एक कश में बहुत नशा है.. एक बार सुनने के बाद फिर से सुनने कि तलब लगती है.. बहुत अल्हदा किस्म की फ़िल्म लग रही है नो-स्मोकिंग और संगीत ने भी इस धारणा को और मजबूत बना दिया है... एल्बम के सारे गीत फ़िल्म की नायिका (सिगरेट.. शायद खलनायिका भी कह सकते हैं) और नायक जौन के उसके मोहपाश में बंधे होने की दास्तां को बयां करते हैं...
सिगरेट की खौफ़नाक़ खूबसूरती के मंज़र बहुत खूबी से इस एलबम के गीतों में उकेरे गये हैं
गुलज़ार साब ने अपने गीतों मे सिगरेट पीने वालों की ज़िन्दगी के एक्स-रे, सर्जरी और पोस्ट-मार्टम कविताई अन्दाज़ में पेश किये हैं..


एल्बम का पहला गीत अदनान सामी ने गाया है और क्या खूब गाया है.. सिगरेट की सुलगन और ज़िन्दगी की क़तरा कतरा पिघलन को, उलझन को डूब के गाया है

फिर तलब, है तलब...
बेसबब, है तलब
शाम होने लगी है, लाल होने लगी है

जब भी सिगरेट जलती है, मैं जलता हूं
आग पे पाँव पड़ता है, कमबख़्त धुएं में चलता हूं

"फिर किसी ने जलाई, एक दिया सलाई
आसमां जल उठा है, शाम ने राख उड़ायी"

नायक के अन्दर की धीमी धीमी सुलगन, और धीरे धीरे ही राख में तब्दीली को गुलज़ार अपने ही अन्द्दज़ में बहुत खूबी से कह जाते हैं

"उपले जैसे जलता हूं, कम्बख्त धुएं में चलता हूं"

और विजुअल कन्स्ट्रक्शन देखिये
"लम्बे धागे धुएं के सांस सिलने लगे हैं
प्यास उधड़ी हुई है, होठ छिलने लगे हैं
शाम होने लगी है, लाल होने लगी है" (ज़िन्दगी की शाम, खून की लाली?)

गीत सुनने के बाद ये अन्दाज़ा लगाना नामुमकिन हो जाता है कि गीत का सबसे मजबूत पक्ष अदनान की गायकी में है, विशाल की शानदार कम्पोजिशन में या गुलज़ार साब के शब्दों मे.. तीनों का मेल एल्बम को बेहतरीन शुरुआत देता है. गीत बाद मे सुनिधि की अवाज़ में भी है, और वो गीत भी बहुत खूबसूरत बन पड़ा है.. मगर अदनान के सामने थोड़ा फीका सा लगता है..

अगला गीत "फूंक दे" भी दो बार है, रेखा भारद्वाज और सुखविन्दर सिंह के स्वरों में.. यकीन मानिये दोनो वर्शन दो अलग अलग गीतों सा मज़ा देते हैं.. रेखा का वर्शन रस्टिक फ्लेवर में है.. और गुलज़ार साब के बोल सिगरेट के ज़हर के अपने ही तरीके से बयां करते हैं

"हयात (ज़िन्दगी) फूंक दे, हवास (रूह) फूंक दे
सांस से सिला हुआ लिबास (शरीर) फूंक दे.. "

"पीले पीले से जंगल में बहता धुआं
घूंट घूंट जल रहा हूं, पी रहा हूं पत्तियां" (तम्बाक़ू की)


कश लगा एल्बम का अगला गीत है.. सुखविन्दर, दलेर मेहंदी और स्वयं विशाल भारद्वाज की आवाज़ में कव्वालीनुमा गीत है... तीनों गायकों का तालमेल अच्छा बन पड़ा है.. गीत अल्बम को मोनोटोनस होने से बचाता भी है, फिर भी एल्बम क सबसे कमजोर गीत है

"ये जहान फ़ानी है...बुलबुला है, पानी है
बुलबुलों पे रुकना क्या, पानियों पे बहता जा"


इसके बाद बारी आती है एल्बम के सबसे खूबसूरत लिखे गये गीत ’एश-ट्रे’ की.. विशाल की कम्पोसिशन गीत के मूड के मुताबिक है और और नये गायक देवा सेन गुप्ता इस मुश्किल से गीत को सफलता से निभा गये हैं...

"बहुत से आधे बुझे हुए दिन पड़े हैं इसमे
बहुत से आधे जले हुई रात गिर पड़ी हैं
ये एश-ट्रे भरती जा रही है"

बहुत खूब!


फिर तलब... है तलब...
इस तलब के लिये बहुत बहुत शुक्रिया..
विशाल को, गुलज़ार साब को, और अनुराग कश्यप को, जिन्होने बिकाऊ संगीत के बजाय ऐसा संगीत चुनने में हिम्मत और ईमानदारी दिखायी जो स्क्रिप्ट के अनुरूप है..


और मैं फिर से री-वाईण्ड कर रहा हूं...

मंगलवार, अक्टूबर 02, 2007

सचिन देव बर्मन स्मृति [मेरे पिताजी का बोया पौधा गुलज़ार ] Pancham Remembers

आज सचिन देव बर्मन जी का १०१वां जन्मदिवस है. गुलज़ार साब ने सचिन दा के साथ ही गीतकार के रूप में शुरुआत की थी... प्रस्तुत है इस अवसर पर पंचम का 80 के दशक का लिखा एक आलेख "मेरे पिताजी का बोया पौधा - गुलज़ार"



मेरे पिताजी का बोया पौधा - गुलज़ार

आज से लगभग बीस साल पहले की बात है. एक दिन मेरे पिताजी (स्व सचिन देव बर्मन) मुझे अपने साथ 'मोहन स्टुडिओ' ले गये, जहां बिमल-दा की फ़िल्म सुजाता की 'सिटिन्ग' थी. मैं वहां के लोगों के लिये बिल्कुल नया था,
इसलिये पिताजी ने मुझे बिमल-दा की यूनिट के सभी लोगों से मिलाया. उन्हीं में से एक थे बिमल-दा के असिस्टेन्ट - गुलज़ार

उनके नाम से मैने समझा कि शायद वे किसी मौलवी के रिश्तेदार होंगे, लेकिन जब उनका असली नाम पढा, तब मैने जाना कि वास्तव में वो सिख हैं पर बाल कटवा दिये हैं.

तब से ही हम लोगों की जान पहचान हो गयी.

उन दिनो मैं पिताजी का असिस्टेन्ट हुआ करता था. मेरे कोइ खास दोस्त नहीं थे, इसलिये गानों की सिटिन्ग खत्म होने पर मैं सीधा गुलज़ार के पास चला जाता था. उन दिनों वे जुहू में रघुनाथ झालानी वगैरह के साथ रहते थे.
वहीं जाकर मैं उन सबके साथ बैठता था. वहां हम दोनो की बात-चीत सिर्फ़ फ़िल्मों पर ही हुआ करती थी. अच्छी बात ये थी कि हम लोग सिर्फ़ काम की बातें किया करते थे, फ़ालतु बात तो शायद कभी की ही नहीं. उन बैठकों में
मुझे फ़िल्म कला के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला.

फिर आयी फ़िल्म 'बन्दिनी'. गुलज़ार ने इसमे मेरे पिताजी के संगीत निर्देशन में एक बडा खूबसूरत गीत लिखा 'मोरा गोरा अंग लई ले'. लेकिन चुंकि उस वक्त पिताजी के साथ पहले से ही कुछ दूसरे गीतकारों की टीम बन चुकी थी, इसलिये गुलज़ार को उनके साथ काम करने का उतना मौका न मिल सका, जितना की उन्हें वास्तव में मिलना चाहिये था

तभी से मेरे मन में यह बात घर कर गयी थी कि अगर कभी मैं संगीत निर्देशक बना, तो इनके साथ ज़रूर काम करूंगा.

बाद में मैं संगीत-निर्देशक बन गया, और फिर आयी फ़िल्म 'परिचय', जिसमे हम दोनो पहली बार एक-दूसरे से गीतकार-संगीतकार के रूप में मिले

एक दिन की बात है. मैं किसी फ़िल्म की 'बैक-ग्राउन्ड म्युजिक' के सिल-सिले में 'राज-कमल स्टुडिओ' गया हुआ था. वहां गुलज़ार भी थे.. उन्होने मुझ-से कहा...
"पन्चम! एक गीत का मुखडा है, देखो कैसा लगता है!"

मैने कहा "लिखवा दें"

उन्होने वह मुखडा मुझे लिखवाया. जादू था उन शब्दों में ! मैं बिल्कुल चमत्क्रत सा रह गया था उसे सुन-कर! मेरे मन में उसी वक्त यह इच्छा हुई की यह कह दूं कि एक संगीतकार को जितने अच्छे बोल, 'मूड' और 'एक्सप्रेशन्स' मिलते हैं, वह उन्हें उतनी ही अच्छी तरह से स्वर-बद्ध करने की कोशिश करता है. लेकिन मैं कुछ बोला नही.

वह कहने लगे, "अच्छा! मैं चलता हूं."

इस पर मैने कहा, "नहीं! ज़रा दो मिनट ठहरिये"

तब उन्होने देखा की मैं किस तरह गाने कम्पोस करता हूं. लगभग पांच मिनट तक सोचने के बाद मैने उस मुखडे को सुर में ढालने की कोशिश की. लेकिन कोइ खास बनती नज़र नहीं आयी.

तब उन्होने कहा, "चलता हूं, परसों मिलेंगे"

मैं रास्ते भर उसी मुखडे के बारे में सोचता हुआ, उसे तरह तरह के सुरों में गुन-गुनाता हुआ घर लौटा. और उसी रात अपनी फ़िल्म की 'बैक-ग्राउन्ड म्युजिक' खत्म करने के बाद मैं तुरन्त गुलज़ार के घर गया. जब वे बाहर आये,
मैं उन्हें सीधे अपनी कार के अन्दर ले आया. कार में एक 'टेप-रेकोर्डर' लगा हुआ था. उस्में मैने वही मुखडा - जो उन्होने सुबह लिखवाया था - अपनी आवाज़ में थोडी बहुत म्युजिक के साथ रेकार्ड कर लिया था.

मैने टेप चला दिया. गीत बजने लगा

मुसाफ़िर हूं यारों
ना घर है, न ठिकाना
मुझे चलते जाना है
बस चलते जाना

उसे सुनकर वे बहुत खुश हो गये और बोले "पन्चम! गाना बहुत खूबसूरत बना है. इसे परसों तक रेकार्ड करना है."

मैने सोचा कि चलो मेरी मेहनत सफल हुई. लेकिन साथ ही एक परेशानी भी आ खडी हुई. ईश्वर की दया से उन दिनों मैं काफ़ी 'बिज़ी' संगीतकार हो गया था. उसी बीच बहुत सारे काम भी निपटाने थे. इसलिये मैं सोचने लगा कि परसों तक कैसे रिकार्ड करूंगा ? वक्त ही नहीं है. बडी मुश्किल होगी.

अपनी परेशानी ज़ाहिर करने के लिये मैं एक मिनट चुप रहने के बाद उनसे बोला,
"गुलज़ार! तूने मुखडा तो बहुत अच्छा दिया, लेकिन अंतरा बहुत बकवास कर दिया."

यह सुनते ही वे हंस पडे.

उस दिन से हम दोनो काम की दोस्ती में बंध गये. अब हम जब कभी काम के लिये बैठते हैं, तो काम सोचकर नहीं करते हैं. बल्कि उसे 'एन्जाय' करते हैं. अब हम दोनो की आपस में ऐसी 'ट्यूनिंग' हो गयी है के हमेशा यही होता है कि कभी-कभी पहले वे कुछ बोल लिख देते हैं, और उनके 'एक्सप्रैशन्स' को समझ कर उसी के हिसाब से मैं धुन बनाता हूं; और कभी कभी मैं पहले धुन बनाता हूं और उसके 'एक्सप्रैशन्स' के अनुसार वे बोल लिख देते हैं.

लेकिन बात हमेशा बढिया बनती है!

वे कभी भी 'सिटिंग' के लिये कोइ टाइम वगैरह 'फ़िक्स' करके नहीं आते हैं. अपना घर जानकर, अधिकार के साथ, जब जी चाहे चले आते हैं. ऐसे समय में मैं उनसे कहता हूं, "मुझसे काम करवाने आये हो?"

जवाब में वे मुस्कराकर कहते हैं, "पागल हो गये हो ?, मैं तुमसे नहीं, गोरखे से काम लेने आया हूं."

मुझे अकसर वे प्यार से 'गोरखा' कह कर भी पुकारते हैं.

अब तो हम दोनो की एक टीम बन गयी है. अब उन्हैं मेरे संगीत-निर्देशन में फ़िल्म 'गोलमाल' के लिये लिखे गये गीत - 'आने वाला पल जाने वाला है...' - पर 'फ़िल्मफेयर पुरस्कार' मिला तो उस वक्त मुझे लगा कि आज मेरे स्वर्गीय पिताजी का बोया पौधा कितना विशाल हो गया है! जो काम उनसे अधूरा छूट गया था, शायद वह मेरे हाथों पूरा हो रहा है - यह सोचकर खुशी से मेरी आंखें भर आयी थी.

हालांकि, हम दोनों ने बहुत सारी फ़िल्मों में साथ-साथ काम किया है, लेकिन एक बात आज तक मेरी समझ में नहीं आयी है. जब कभी मैं अपने दोस्तों को अपने 'रिकार्ड' किये हुए कुछ ताजे गीत सुनाता हूं, और उनमें से अगर एक भी गीत गुलज़ार का होता है, तो ना जाने कैसे वे लोग तुरंत 'पिन-प्वाइन्ट' कर देते हैं कि यह गीत 'गुलज़ार-टाइप' का है, ज़रूर गुलज़ार का लिखा होगा!

यह 'गुलज़ार-टाइप' क्या है? इसका क्या राज़ है? सच पूछिये तो यह बात मुझे भी नहीं मालूम. जब दोस्तों से पूछता हूं कि आखिर ये 'टाइप' क्या है, तो वे कहते हैं कि ये तो सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है, बयान नहीं किया जा सकता.

शायद ये चमत्कार गुलज़ार के शब्दों क है! उनके अनोखे 'एक्सप्रैशन्स' का है!

अन्त में , एक बात अपनी तरफ़ से और लिखना चाहूंगा, हालांकि, गुलज़ार बहुत पढे-लिखे, समझदार और काबिल गीतकार हैं - लेकिन उनका स्वभाव बिल्कुल बच्चों जैसा है.

राहुल देव बर्मन

रविवार, सितंबर 30, 2007

Ikiru ka Anand - How I saved my castle

Sep.30.2007
First of all, let me tell you I am not a film reviewer.. I dont want to be one as I believe all the reviewers have their own biases and preferences like any other audience watching the film. I also believe most of the great films have boring reviews and sometimes the greatness of a film is beyond the reach for many of the reviewers.. of course all badly made films provide much better opportunity to have the most entertaining reviews on them..
On the following lines, you will not find a review but a reaction and its a reaction to a comment I read sometime back, by a person I admire to a great extent Javed Siddiqui saab. A comment that set me to a journey to find answers and made me to actually review a film.
It was about a film that is one of the most inspiring one of my life so far.. He once quoted “Hrishikesh Mukherjee’s Anand was inspired from Kurosawa’s Ikiru”.. Reading the line caused a mild heart attack to me.. Anand has been so dear to me for its characters, screenplay, dialogs, direction, acting, music.. for everything it had.. It is The Film which laid foundation for my castle of admiration for people like Hrishikesh Mukherjee, Gulzar, Bimal Dutt, NC Sippy, Amitabh Bachchan and The Cinema ofc.. a movie I have seen hundreds of times and can still watch it for all my life.. “Waise bhi Meri judwaan hai ye.. hum dono 1971 ki paidaaish hain”… When 20-25 years later you come to know from a respectable name that it was not original, you are bound to find a few cracks in the castle.. and the cracks got wider when a reliable friend confirmed me that Anand was a remake of Ikiru..

Ikiru means "to live"
To Live
To save my castle I started the hunt.. I could find the DVD of Rashomon in the process but not of Ikiru..but thanks to the magical glove of internet, I could finally get the film a few months back…and it was the beginning of the next challenge.. to find time (with time I mean dedicated quality time for film viewing, which is very very difficult to people like me who runs a small company with different clients from different time zones US East Coast, West Coast, India (subah se lekar shaam tak, shaam se lekar raat tak.. raat se lekar subah tak, subah se phir shaam tak.. bas kaam karo, bus kaam karo) and above it a demanding 3.5 year old son ..)… So only after a wait of about 4 months I could find an opportunity when I got a chance to travel and I didn’t missed the opportunity.. With the help of my laptop (what a great asset to have) and a set of headphones, I got transmitted in to the world of Ikiru… and a wonderful world it was…
[Spoilers Ahead.. not many and am sure not to the extent of ruining the chance of your future watching]
Ikiru (To Live) is a simple and heartwarming tale of the main protagonist of the film Mr. Watanabe, a widower living with his son and daughter-in-law (To what I have seen of Mr. Kurosawa, This hero is quite an unspectacular ordinary human-being in comparison to the heroes of Rashomon or Seven Samurai).. Leading a robotic life in a government public works department doing absolutely nothing.. He is as good as a dead man, just killing his time and the most important job he does (as per the dialogs) is to keep his chair warm.. Just after introductory scene, you come to know that Mr. Watanabe is representing the system how Japan functions.. whole system is dead like him, killing time and doing nothing.. a group of female petitioners from a basti files a proposal to office to develop a public and park playground for their children instead of polluted water pool, and they are sent from one department to another, from there to another in a masterly crafted sequence… when they reach Watanabe Seat, the audience is made aware that something unusual has happened today.. Mr. Watanabe is not on the seat for the first time.. Actually he is meeting the doctor and faces the fact that he is going to die soon due to a cancer.. He has at the most 3 months to live…
Watanabe with Novelist3 months to live and he want to LIVE now… A brilliantly crafted scene that takes you back to his past and you know how and why he spent his last thirty years working like a robot and doing nothing, for his son.. His relationship (or the failure of it) with his son is brilliantly handled and Mr. Watanabe realizes that he has been a complete failure on both family and office fronts.. and the failure of relationship with his family also poses a big question, how and where is he going to find happiness for the rest of life.. he has money but no idea how to spend it to Live.. He visits a bar, interacts with a stranger novelist (very interesting interaction) who takes him for gambling and dance bar.. The dance bar scene provides another great moment when Watanbe sings “Life is short.. fall in love”
In search of Life To Live, he starts interacting with a subordinate girl in his office, who had earlier nicknamed him as “The Mummy”.. Watanbe want her to help him to live.. he is jealous of her, for her energy and vibrancy . The family (Son and D.I.L) suspects him of having illicit relationship and thinks that he is spending all the money on the girl.. but the duo have a different kind of relationship.. Still in the company of the girl, Watanbe tries to extract too much out of her, in too short span of time.. It fails eventually but finally leads to an answer of his search, how would he like to spend his rest of life.. we are just two-third into the film and we find Mr. Watanbe is no more. Rest of the film takes the film to another interesting direction where people from family and government office are gathered to pay tributes to Mr. Watanbe and they start discussing all the changes in his behavior, all the gossips surrounding him in last few months and the mystery of his death..Kind of a postmortem of his life..
In the long long discussion during the homage, the director discuss the events of last few months of Watanbe thru the eyes of his co-workers and associates.. The discussions, gossiping, arguments, counter arguments and fight (like a parliamentary session), lead them to a realization the Mr Watanbe indeed achieved some thing in life and HE WILL LIVE ON.. the Climax is just fantastic will definitely leave you with a happy heart yet moist eyes.. In the end you feel really satisfied; you have seen a good powerful film…
and the best feeling for me was my Castle is saved…

(In case you are still reading and have enough strength left to read on)
honestly I never wanted to tell you the above story specially If you have not seen the film but later I realized I have to, to compare it with Anand… but I am sure the above paragraphs wont spoil the pleasure of watching this film.. Now coming back to Siddiqui saab’s comment, I am not sure what made him comment that Anand is based on Ikiru.. Either he has not seen any of the two films and made his comment on what he has heard from some other sources.. ofc There is a similarity, infact a very thin line of similarity that the main protagonist is going to die soon and he knows about it.. The subsequent events to this realization in initial reels are handled totally differently in the two films.. Watanbe and Anand are poles apart as a character. You feel sorry for Watanbe all throughout the film, but never ever for Anand, as he never lets you to do so..
Ikiru has a different class.. to me its not a single film but three brilliant films for the price of one.. It has three different segments connected yet independent that can inspire three different film makers to make three different films.. Infact I find films like Chhoti Chhoti Baatein (Moti Lal’s first film as director and eventually turned out to be his last film) and Annadata (OmPrakash) are inspired by the middle segment.. Another film was Mahesh Bhatt’s Kabza which could be inspired from another segment.. Baghbaan too.. much more than Anand.. but none of the other inspired ones could get any closer to Ikiru or Anand..
Talking of Ikiru and Anand, it could be possible that Hrishi da has seen the film, yet he created a totally different world of Anand. Anand as a person has infact no similarity to Watanbe and poles apart in terms of vibrancy and flamboyance.. It still is the unique most character of all the films I have seen so far.. Infact the time spent with Ikiru has been instrumental in growing my admiration for Anand and its crew many more times.. It will Live On.. Anand Mara Nahin, Anand Marte Nahin..
and Thanks Siddiqui saab for introducing me to Ikiru!!!
On that Note of Joy (Anand), One question that always troubles me is

"Anand had a changeover in persona only after he realizes he is going to die soon? or he was the same happy Anand all though out his life.. is it the news of unavoidable death arriving soon made him The Anand we love and admire?


I can't afford to hate people. I don't have that kind of time - Ikiru


[Originally published on passionforcinema.com in Sep 2007]


शुक्रवार, सितंबर 28, 2007

मीरा : विचार से पर्दे तक का सफ़र [ Gulzar on the making of Meera ]

मीरा : विचार से पर्दे तक का सफ़र
गुलज़ार

(फ़िल्म पूरी होने से पूर्व १५ दिसम्बर १९७५ को लिखा आलेख, राधाकृष्ण पर प्रकाशित 'मीरा' से साभार)

प्रेम जी आये एक रोज़ । सन १९७५ की बात है । साथ में बहल साहब थे - श्री ए.के. बहल । प्रेमजी ने बताया कि वह 'मीरा' बनाना चाहते हैं ।

बस, सुन के ही भर गया ! यह ख़याल कभी क्यों नहीं आया?
उस 'प्रेम दीवानी' का ख़याल शायद सिर्फ़ प्रेम जी को ही आ सकता था ।

बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रेम जी को 'दीवान-ए-ग़ालिब' ज़ुबानी याद है । ऐसी याददाश्त भी किसी दूसरे की नहीं देखी । उर्दू अदब के सिर्फ़ शौक़ीन नहीं, दीवाने हैं; और अन्ग्रेज़ी में कल तक आख़िरी किताब कौन-सी छपी है,
बता देंगे, और यह भी कि:
'मार्केट में अभी आयी नहीं । उसका 'थीम' कुछ ऐसा है...।'

किताबें ज़ुबानी याद रखने की उन्हें आदत-सी हो गयी है । ऐसे प्रोड्यूसर के साथ काम करना वैसे ही ख़ुशक़िस्मती की बात है, और फिर 'मीरा' जैसी फ़िल्म पर!

अगस्त १९७५ में 'मीरा' बनाने का फ़ैसला तय पा गया । १४ अक्तूबर सन १९७५ को 'मीरा' के मुहूर्त का दिन निकला । दिन दशहरे का था ।

यह ख़याल भी प्रेम जी का ही था कि मुहूर्त लताजी से करवाया जाये । आज की 'मीरा' तो वही हैं!

प्रेम जी ख़ुद बडे शर्मीले क़िस्म के इंसान हैं । बडे से बडा काम करके भी खुद पर्दे के पीछे रहते हैं । यह ज़िम्मेदारी उन्होने मुझे सौंप दी।

लता जी मुहूर्त के लिये तो राज़ी हो गयीं, लेकिन उन्होने फ़ौरन हमारे कान में यह बात भी डाल दी कि वह इस फ़िल्म के लिये गा नहीं सकेंगी। मौक़ा और वक़्त ऐसा था कि बहस करना मुनासिब न समझा, सो मुहूर्त हो गया, लेकिन लगा कि कहीं एक सुर कम रह गया है!

भूषण जी दिल्ली से मीरा पर किताबों का सूटकेस भरकर ला चुके थे, और उन्हें पढना, उलटना-पलटना शुरू कर चुके थे। किताबें बेहिसाब थीं, और मीरा कहीं भी नहीं! यह राम-कहानी आप भूषण जी की ज़ुबानी ही सुनियेगा । भूषणजी की याददाश्त भी कमाल की है; उन्हें जिल्द समेत किताब चट कर जाने की आदत है। और कहीं इतिहास की चर्चा छिड जाये तो बता देंगे - मोहन-जो-दडो में चीटियों के बिल कहां कहां पर थे!

इतनी सारी उलझा देने वाली बातों में से , ज़ाहिर है, कोई एक रास्ता अपनाना ज़रूरी था । छोटी-मोटी समझ-बूझ के अनुसार जो चुना वही आप फ़िल्म में देखेंगे । लेकिन इस फ़िल्म की आप-बीती भी मीरा के संघर्ष से किसी तरह कम नहीं ।

सन १९७६ में स्क्रिप्ट तैयार हुई और जून १९७६ से शूटिंग शुरू होनी थी । उम्मीद थी, आठ-दस माह में फ़िल्म की शूटिंग पूरी हो जायेगी ।

'मीरा' के 'पति' की तलाश में उतनी ही दिक्कत हुई जितनी कि हेमा को अपनी ज़िन्दगी में... या कहिये, हेमा की मम्मी को बेटी का वर ढूंढने में हुई हो, या हो रही हो! कोई हीरो यह रोल करने को तैयार नहीं था । किस-किस की
ड्योढी पर शगुन की थाली गयी, कहना मुश्किल है । ख़ुद कृष्ण होते तो शायद... । आख़िरकार अमिताभ मान गये ।

१९ जून १९७६ को शूटिंग का पहला दिन था । इसीलिए मई में 'मेरे तो गिरधर गोपाल' की रिकार्डिंग रखी गयी थी । सबसे पहले इसी गाने को फ़िल्माना था । लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को हम लता जी की मर्ज़ी बता चुके थे; उन्हें फिर भी यक़ीन था कि वे लता जी को मना लेंगे। रिकार्डिंग से कुछ दिन पहले लक्ष्मीजी ने लताजी से बात की । और उन्होने फिर इंकार कर दिया । लक्ष्मीजी दुविधा में पड गये । मुझसे कहा कि आप ख़ुद एक बार और लताजी से कहकर देखिये । मैंने फिर बात की लताजी से । उनके ना गाने की वजह मुझे बहुत माक़ूल लगी । उन्होने बताया कि मीरा के दो प्राइवेट एल.पी. वह गा चुकी हैं और जिस श्रद्धा के साथ उन्होने मीरा के भजन गाये, उसके बाद अब वह किसी भी 'कमर्शियल' नज़रिये से मीरा के भजन नहीं गाना चहतीं। मैंने उनका फ़ैसला लक्ष्मी-प्यारे तक पहुंचा दिया, और दरख्वास्त की कि वह किसी और आवाज़ को चुन लें।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने फ़िल्म छोड दी। इस फ़िल्म में म्युज़िक देने से इंकार कर दिया।

हमारे पास कोई रास्ता नहीं था। फ़िल्म का सेट लग चुका था । प्रेमजी बहुत परेशान थे, लेकिन उनके हौसले का जवाब नहीं; बोले:
'मीरा सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं है.. एक मक़सद भी है.. बनायेंगे ज़रूर!'

गीतों को फ़िलहाल छोडकर हमने १९ जून १९७६ से फ़िल्म की शूटिंग शुरू कर दी । फ़िल्म में विद्या सिन्हा का प्रवेश अचानक हुआ । उस छोटे से रोल के लिये उसका राज़ी हो जाना मुझ पर एक निजी एहसान था । शायद दूसरी कोई हीरोइन उसके लिये तैयार न होती । पहली शूटिंग हमने हेमा और विद्या के साथ की, और गौरी के साथ - जिसने ललिता का रोल किया है ।

दो दिन में यह सेट ख़त्म हो गया।

एक बार फ़िर 'वर' की तलाश शुरू हुई । 'मीरा' के लिये म्युज़िक डायरेक्टर भी चाहिये था । 'पंचम', यानी आर.डी. बर्मन, मेरे दोस्त हैं । उनसे पूछा, वह भी तैयार न हुए। लता जी से ना गवा कर वह किसी वाद-विवाद या कंट्रोवर्सी में नहीं पडना चाहते थे।

इस नुक़्ते को लेकर किसी तरह के वाद-विवाद की बात मेरी समझ में भी नहीं आती थी । अब सभी तो दिलीप कुमार को लेकर फ़िल्में तो नहीं बनाते! और अगर दिलीप साब किसी फ़िल्म में काम ना करें तो... क्या प्रोड्यूसर फ़िल्में बनाना छोड दें, या डायरेक्टर डायरेक्शन से हाथ खींच ले? मुझे लगा - उन सब के 'कैरियर' सिर्फ़ एक आवाज़ के मोहताज हैं । उस आवाज़ के सहारे के बग़ैर कोई एक क़दम भी नहीं चल सकता । बहरहाल यह मसला म्युज़िक डायरेक्टर का था । कुछ हफ़्ते तो ऐसी परेशानी में गुज़रे कि लगता था, यह फ़िल्म ही ठप हो जायेगी । तभी फ़िल्म के आर्ट डायरेक्टर देश मुखर्जी ने एक दिन एक नाम सुझाया । और वह नाम फ़ौरन दिल-दिमाग़ में जड पकड गया - पंडित रविशंकर !

पंडितजी बहुत दिनों से अमरीका में रहते थे । हिन्दुस्तानी फ़िल्मों में म्युज़िक देना तो वह कब का छोड चुके थे!
पता-ठिकाना मालूम करना भी दूर की बात लगी, और फिर अगर वो मान भी जायें तो इतने गाने कब और कैसे रिकार्ड होंगे ? हर गाने कि रिकार्डिंग के लिये तो उन्हें अमरीका से बुलवाया नहीं जा सकता । फिर भी, एक चिराग़ जला तो सही... चाहे बहुत दूर ही सही ।

पांच-सात दिन की कोशिशों के बाद हम दोनों के दोस्त हितेन चौधरी ने पंडितजी का फ़ोन नम्बर लाकर दिया, और बतलाया कि फ़लां तारीख़ को वह तीन दिन के लिये इस नम्बर पे लंदन आकर ठहरेंगे । चाहें तो उनसे बात कर लीजिये । चौधरी साहब से हमने अनुरोध किया 'आप परिचय करवा दीजिये, हम बात कर लेंगे' ।

पंडित जी लंदन में थे । मैंने बात की ।

आवाज़ अगर शख्सियत से ढंके पर्दों को खोल कर कोई भेद बता सकती है, तो मैं कह सकता हूं - बातचीत के इस पहले मौक़े पर्ही मुझे उम्मीद हो गयी थी कि पंडित जी मान जायेंगे । इतनी बडी हस्ती होते हुए भी उनकी आवाज़ में बला की नम्रता थी । उनकी शर्त बहुत सादा और साफ़ थी - ' मुझे फ़िल्म की स्क्रिप्ट सुना दीजिये । अच्छी लगी तो ज़रूर संगीत दूंगा'

अगले दिन ही पंडित जी न्यूयार्क जा रहे थे । प्रेमजी ने फ़ौरन फ़ैसला कर लिया : 'आप न्यूयार्क जाइये और हितेन दा को साथ ले जाइये । आप जो मुनासिब समझें, वह फ़ैसला कर आइये ।'

हितेन-दा पुराने दोस्त हैं, मान गये । ३१ जुलाई १९७६ को मैं न्यूयार्क में था । लेकिन पंडित जी न्यूयार्क में नहीं थे।

३ अगस्त को पंडित जी न्यूयार्क लौट आये । उसी शाम उनसे मुलाक़ात हुई । मुलाक़ात के आधे घंटे बाद ही मैंने स्क्रिप्ट सुनानी शुरू कर दी । पूरे दो घंटे चालीस मिनट लगे मुझे स्क्रिप्ट सुनाने में । उसके तीन मिनट बाद ही
'मीरा' को म्युज़िक डायरेक्टर मिल गया !

बाकी सारी बातें हितेन-दा ने तय करा दीं ।

लताजी से जो बात हुई थी मैंने पंडित जी को बतला दी । उन्हें भी अफ़सोस ज़रूर हुआ कि लता जी गातीं तो अच्छा होता ।

लता जी उन दिनों वाशिंगटन में थीं । दो दिन बाद मेरा वाशिंगटन जाना हुआ तो मैंने लताजी से बात की और यह बता दिया कि पंडितजी 'मीरा' के लिये संगीत दे रहे हैं

वहीं - 'वाटरगेट होटल' में मुकेश जी से ज़िन्दगी की आख़िरी मुलाक़ात हुई । शायद नसीब में ऐसा होना लिखा था । रविशंकर जी के चुनाव पर उन्होने मुझे मुबारकबाद भी दी थी । वहीं, उसी दौरे में मुकेशजी का देहांत हो गया।

न्यूयार्क में एक दिन निहायत ख़ूबसूरत आवाज़ का फ़ोन आया :
'मैं फ़िल्मों में काम करना चाहती हूं, लेकिन आप किसी को बताइयेगा नहीं !'
'अरे' मैंने हैरत से कहा, 'आप फ़िल्मों में काम करेंगी तो छुपायेंगी कैसे?"
'छुपाने को थोडे ही कहती हूं, आप बताइयेगा नहीं ! लोग अपने आप देख लेंगे!'

वह दीप्ती थी - दीप्ती नवल ! किसी न किसी रोज़, एक ना एक फ़िल्म में आप उसे ज़रूर देखेंगे !

सोलह अगस्त तक मैं पंडित जी के साथ था । उनके बेहद व्यस्त प्रोग्राम में, जहां जहां वक़्त मिला, वह मीरा के भजनों पर काम करते रहे, स्क्रिप्ट पर अपने नोट विस्तार से लेते रहे । सोलह अगस्त को जब पंडित जी के साथ आख़िरी बैठक हुई तो उस दिन तक बम्बई में हमारी रिकार्डिंग की तमाम तारीख़ें और स्टुडियो बुक हो चुके थे । और सब से अहम बात जो तय हो चुकी थी, वह यह कि मीरा के गाने गायेंगी - वाणी जयराम

नवम्बर के शुरू में पंडित रविशंकर हिन्दुस्तान पहुंचे । २२ नवम्बर १९७६ से गानों की रिहर्सल शुरू हुई । ३० नवम्बर से महबूब स्टुडियो में वसंत मुदलियार कि देख रेख में 'मीरा' के गानों की रिकार्डिंग शुरू हुई और १५
दिसम्बर १९७६ तक 'मीरा' का पूरा म्युज़िक रिकार्ड हो चुका था! एक व्यक्ति, जिसने अनथक मेहनत की इस काम को पूरा करने में वह थे श्री विजय राघव राव, जो पंडित जी का दाहिना हाथ ही नहीं, दोनों हाथ हैं ।

मीरा का संगीत पूरा हुआ, शूटिंग की तैयारी शुरू हुई और...
अमिताभ बच्चन ने फ़िल्म छोड दी ।

'वर की तलाश फ़िर से शुरू हो गयी। फ़िल्म फिर रुक गयी ।

इस बार कई महीने लग गये। किसी नये कलाकार को भी लिया जा सकता था, मगर एक बडी मुश्किल थी कि उन्हीं दिनों 'मीरा' की ज़िन्दगी पर एक और फ़िल्म रिलीज़ हुई और फ़्लाप हो गयी । इंडस्ट्री में - मीरा की कहानी पर एक अभिशाप है - कहा जाने लगा । नये अभिनेता को लेकर प्रेमजी के लिये फ़िल्म बेचना ज़्यादा मुश्किल हो जाता । डिस्ट्रीब्यूटर्स की दिलचस्पी यूं ही टूट रही थी । उनका ख़याल था, प्रेम जी अब यह फ़िल्म पूरी नहीं कर पायेंगे । लेकिन एक बार फिर उनके हौसले की दाद देनी पडती है । चुपचाप वह अपने इंतजाम में लगे रहे । मुझसे कहा : 'आप शूटिंग शुरू कीजिये । 'मीरा' ख़ुद ही कोई रास्ता बतायेगी । अगर वह अपनी लगन से नहीं हटी, तो हन क्यों हट जायें ?'

२५ मई १९७७ से इस फ़िल्म की बक़ायदा शूटिंग शुरू हुई ।

राजा भोज के द्रुश्यों को छोडकर - जो भी शूटिंग मुमकिन थी - वह चलती रही । और फिर एक दिन अचानक ही राजा भोज मिल गये ।

विनोद खन्ना राजा भोज का रोल करने के लिये तैयार हो गये । वह महीना जनवरी का था, सन १९७८ ।

विनोद बस एक दिन के लिये सेट पर आये थे । बाक़ी तारीख़ें सितम्बर १९७८ से शुरू होती थीं और इस हिसाब से नवम्बर तक फ़िल्म पूरी हो जाती थी। अगस्त १९७८ में विनोद खन्ना ने फ़िल्म-लाइन त्याग देने का फ़ैसला कर लिया ।

जनवरी के उस एक दिन की बंदिश के लिये विनोद ने 'मीरा' पूरी करने की हामी भर ली थी । 'मीरा' समझिये कि बाल बाल बच गयी, वर्ना फिर वही तलाश शुरू हो जाती ! सितम्बर में विनोद ने शूटिंग शुरू की और इधर पंडित जी का तार भी मिला ।

मुझे ये बताने की मोहलत नहीं मिली कि सन १९७६ में जब फ़िल्म का संगीत रिकार्ड किया गया था तो हमने सितम्बर १९७७ की तारीख़ें फ़िल्म के बैकग्राउंड म्युज़िक के लिये तय कर ली थीं । अब सन १९७८ आ चुका था और पंडितजी पूछ रहे थे कि फ़िल्म का बैक-ग्राउन्ड म्युज़िच रिकार्ड होना कब शुरू होगा? क्योंकि इस साल सितम्बर में अगर बैक-ग्राउंड म्युज़िक न रिकार्ड हो पाया, तो पंडित जी अप्रैल १९७९ तक हिन्दुस्तान नहीं आ पायेंगे ।

प्रेम जी मुस्करा दिये । एक शेर पढा :

रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमां
हो रहेगा कुछ-ना-कुछ घबरायें क्या !

बडा प्यार आया प्रेमजी पर ।

१५ सितम्बर से २० सितम्बर १९७८ तक के बीच फ़िल्म का बैक-ग्राउंड म्युज़िक भी रिकार्ड कर लिया गया।

फ़िल्म का पूरा होना अभी काफ़ी दूर था । लेकिन पूरी फ़िल्म के हर सीन की अन्दाजन लम्बाई निकाल कर , बगैर फ़िल्म देखे , सिर्फ़ स्क्रिप्ट के भरोसे पर, हमने 'मीरा' का बैक-ग्राउंड म्युज़िक पूरा कर लिया । अक्तूबर से फिर शूटिंग शुरू कर ली । अब बैक-ग्राउंड म्युज़िक पहले था और 'सीन' बाद में ।

नवम्बर में फ़िल्म ख़त्म हो रही थी जब बम्बई में पीलिया की बीमारी फैली । इंडस्ट्री के बहुत से कलाकार उसकी लपेट में आ गये । पहली बार... हेमा की वजह से तारीख़ें कैंसिल हो गयीं । बेचारी बीमारी की गिरफ़्त में आ गयी ।

विनोद की तारीख़ों का मसला फिर वैसे ही सामने खडा है ।

हमारे एक 'मियां मुश्किल-कुशा' हैं - श्री तरन तारन । वही ऐसी मुश्किलें सुलझाते रहे हैं । यह मुश्किल भी उनके सामने रख दी है ।

यह दिसम्बर चल रहा है, आज की ताज़ा ख़बर के अनुसार ३० दिसम्बर को फ़िल्म ख़त्म कर पाऊंगा ।

अंग्रेज़ी में कहते हैं ना : 'टच-वुड'

१५ दिसम्बर, १९७८
गुलज़ार