सोमवार, १२ अक्तूबर २००९

Jugalbandi gulzar - jagjit singh in hyderabad [जुगलबन्दी - गुलज़ार-जगजीत सिंह, हैदराबाद में]

अक्तूबर 11, 2009 (October 11, 2009)

वो शाम बहुत हसीन थी! (report by K Venkat)

हैदराबादी नवाबों के चौमोहोल्ला पैलेस में, खुले आसमां के नीछे, जहां जगजीत सिंह की आवाज़ हवा में सराबोर हुई, वहीं गुलज़ार साब ने अपनी चन्द नज़्मों से ज़िन्दगी के कुछ नये "इमजेस" बना दिये. यूं तो बहुत बार, कई शहरों में जगजीत जी को सुना, मगर कल महफ़िल कुछ और ही रंग में थी. रात तो हर रोज़ होती थी मगर, इस बार, चांद भी था.

गुलज़ार साब और जगजीत जी एक बग्घी में बैठ कर मन्च के पास पधारे, और आते ही दोनों को गुल-पोशी की गयी. फिर जगजीत जी ने महफ़िल की शुरुआत अपनी ग़ज़लों से की. तकरीबन एक घन्टे बाद, जब तक हम बेसब्र हो चले थे, गुलज़ार साब को जगजीत जी ने मन्च पर बुलाया और उनका परिचय भी अपने ही अन्दाज़ में किया "गुलज़ार साब ’मल्टी फ़ेसेटेड पर्सनैलिटि हैं मगर इनके पास एक ही ड्रैस है... (गुलज़ार साब अपने ट्रेडमार्क सफ़ेद लिबास में थे) ...ये प्रोड्य़ुसर, डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राईटर, डायलोग राईटर, लिरिसिस्ट हैं और आज हमारी खुशकिस्मति हैं की वो हमारे बीच कुछ नज़्में लेकर आये हैं"

फिर गुलज़ार साब ने शुरुआत की, के किस तरह ज़िंदगी एक ’हिरन’ की तरह है जिसके पीछे हम भाग रहें हैं और आखिर में ये समझ नहीं आता के कौन किसके पीछे भाग रहा है. फिर हैदराबाद को सलाम करते हुए उन्होने उर्दू ज़बान पे एक नज़्म कही जो मेरे खयाल से, हर उस शख़्स को सुननी चाहिये, जिसे ईश्वर ने बोलने की शक्ति दी हो. फिर बात चली आज के दौर की जहां सब कुछ कम्प्युटराईज़्ड हो गया है और हुम किताबों से किस तरह दूर हो चले हैं. उन्होने कई नज़्मों में अंग्रेज़ी अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल किया मगर जगजीत जी को एक तसल्ली भी दिलायी - "जगजीत मैं अंग्रेज़ी का इस्तेमाल गज़लों में नहीं करूंगा. मगर नज़्म में आज कल के इन नये लफ़्ज़ों का इस्तेमल जायज़ है. अब मैं ‘कम्प्यूटर’ को कुछ और तो नहीं कह सकता". ज़िंदगी के कुछ इमजेस की पोएटिक स्केचेस खींचे, एक नज़्म उम्र के नज़रिये पे पढ़ि (‘अब मैं मकान के ऊपरी मन्ज़िल पे रहता हूं’) और एक नज़्म पाकिस्तान और अपने बीच चल रहे उथल-पुथल के बारे में थी.

आखिर में गुलज़ार साब ने जगजीत जी के बारे में कहा "जगजीत की आवाज़ में सुन कर मुझे मेरे ही लिखी हुई गज़लें, और बेहतर लगने लगती हैं. जगजीत जिस तरह गज़ल को समझ्ते हैं.. किस लफ़्ज़ पे कितना वज़न देना चाहिये और कैसे मनी को उभारना चाहिये, ये उनसे बेहतर कोई और नहीं जानता. ये मैनें पहले भी कहा था, और अब भी कह रहा हूं, "ग़ालिब की आवाज़ - जगजीत हैं" ये कहते हुए ग़ालिब का इन्ट्रोडक्शन "बल्लिमारा के मोहल्ले" नज़्म को पढ़ कर कराया. उन्होने साथ में जगजीत जी से ये इल्तेज़ा भी की "जगजीत जब मैन मन्च से उतरूं और दूसरे हाफ़ की जब शुरुआत करो तो ये मेरी गुज़ारिश है, की वो, ग़ालिब के ग़ज़ल से हो. ये कह कर जब गुलज़ार साब मन्च से उतरे तो जगजीत ने समा की कैफ़ियत को खूब समझ कर सुना दिया "हज़ारों ख्वाहिशैं ऐसीं"

कैमरा नहीं लेकर गया था मगर सैल-फ़ोन से दो-तीन तस्वीरें ली हैं और गुलज़ार साब के सभी नज़्म रिकार्ड भी कर लिये हैं. मगर अभी तक मौका नहीं मिला की उन्हें लैप्टॉप में ट्रान्सफ़र करके आपतक भेज सकूं. अगर रिकार्डिंग क्वालिटी खराब रही तो ये कोशिश ज़रूर रहेगी की सारे नज़्म इन्ग्लिश स्क्रिप्ट लिख कर आपके साथ शेयर करूं.

जय हो!

-वैंकट (हैदराबाद से)

शनिवार, १२ सितम्बर २००९

Breaking Breads with Russians! Gulzar saab in Moscow



Breaking Breads with Russians wearing WWII cap!, Gulzar saab in Moscow

रविवार, ३० अगस्त २००९

Thanks for all the love, respect and birthday wishes!

Gulzar saab has conveyed thanks to everyone for sending birthday wishes last week. In a specially recorded message like every year (though recording is not that great as the phone I used played foul) he has thanked every one for the love, respect and affection of his fans.. He has also recorded a special nazm (roman transliteration below)









पवन, बहुत बहुत शुक्रिया,
क्यूंकि तुम्हारी वजह से, हज़ारों चाहने वालों से राब्ता पैदा होता है, मेरा उनसे ताल्लुक रहता है
उनसे 'कॉंटेक्ट' (contact) होता रहता है.. और सिर्फ़ अपने मुल्क में ही नहीं, हिन्दुस्तान में ही नहीं, हिंदुस्तान के बाहर से भी जो ’मैसेज’ मिलते हैं, जगह जगह से संदेसे मिलते है मुझे मुबारक़बाद के.. यकीन मानो आई गेट ओवरव्हेल्मेड (I get overwhelmed)... छलकने लगता हूं अन्दर से.. और इतनी इज़्ज़त देते हैं, सम्मान देते हैं दोस्त, चाहने वाले!

और सबका शुक्रिया एक एक को अकेले अकेले कर दूं ये मुमकिन नहीं होता तो इसलिये तुम्हारे थ्रू (through) ये आवाज़ उन तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं.. अब.. मशक़ूर बड़ा मामूली सा लफ़्ज़ है कि मैं बड़ा मशक़ूर हूं, बहुत थैन्क्फ़ुल (thankful) हूं, लेकिन उसके बगैर गुज़ारा भी नहीं.. लेकिन इससे मैं बहुत ज्यादा कुछ हूं.. अब शुकराने में कहिये या इस इज़्ज़त से, सम्मान से सर वाकई में झुक जाता है कि इतना प्यार भी मिल सकता है.. अब हरकतें मेरी क्या हैं वो आप लोग मुझसे बेहतर जानते हैं.. लेकिन लगा ज़रूर रहता हूं कुछ ना कुछ हरकतें ऐसी करने में.. और हर साल की तरह एक बार फिर आप तमाम तमाम तमाम चाहने वालों को मेरा बहुत बहुत शुक्रिया.. आपके ख़त मिलते हैं, और बड़े अच्छे, प्यारे प्यारे से ख़त मिलते हैं, बड़े पर्सनल से मिलते हैं

एक काम और किया करता हूं जन्म दिन पर कोशिश करता हूं, कोई न कोई एक नज़्म आप लोगों के लिए पेश कर सकूं.. अगर नीयत हो तो सुन लीजिये.. चलिये एक नज़्म..


"भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको
भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको
उतर के पूछ लूं आखिर मुझे जाना कहाँ तक है!
इसी स्टेशन पे ले आती है ये हर साल मुझको
और रोकती भी नहीं है
जहां जन्म की तारीख़ लिखी है

भंवर के दायरे गर फैल रहे हैं
तो फिर साहिल कहाँ हैं
सिमटता जा रहा है दायरा तो फिर
उम्र का मरकज़ कहाँ पर है

भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको
उतर के पूछ लूं आखिर मुझे जाना कहाँ तक है"

बहुत बहुत शुक्रिया!

you can listen the audio message at
http://www.gulzaronline.com/thanks09/gthanks09.htm

in Roman,


pavan, bahut bahut shukriyaa,
kyU.nki tumhaarI vajah se, hazaaro.n chaahane waalo.n se raabtaa paidaa hotaa hai, meraa unase taalluk rahataa hai
unase contact hotaa rahataa hai.. aur sirf apane mulk me.n hI nahI.n, hindustaan me.n hI nahI.n, hi.ndustaan ke baahar se bhI jo messages milate hai.n, jagah jagah se sa.ndese milate hai mujhe mubaarakbaad ke.. yakeen maano I get overwhelmed... Chalakane lagataa hU.n andar se.. aur itanI izzat dete hai.n, sammaan dete hai.n dost, chaahane waale!

aur sabakaa shukriyaa ek ek ko akele akele kar dU.n ye mumakin nahI.n hotaa to isaliye tumhaare through ye aavaaz un tak pahu.nchaane kI koshish karataa hU.n.. ab.. mashak.oor baD.aa maamUlI saa lafz hai ki mai.n baD.aa mashak.oor hU.n, bahut thankful hU.n, lekin usake bagair guzaaraa bhI nahI.n.. lekin isase mai.n bahut jyaadaa kuCh hU.n.. ab shukaraane me.n kahiye yaa is izzat se, sammaan se sar vaakaI me.n jhuk jaataa hai ki itanaa pyaar bhI mil sakataa hai.. ab harakate.n merI kyaa hai.n vo aap log mujhase behatar jaanate hai.n.. lekin lagaa zarUr rahataa hU.n kuCh naa kuCh harakate.n aisI karane me.n.. aur har saal kI tarah ek baar phir aap tamaam tamaam tamaam chaahane waalo.n ko meraa bahut bahut shukriyaa..
aapake kh.at milate hai.n, aur baD.e achChe, pyaare pyaare se kh.at milate hai.n, baD.e parsanal se milate hai.n

ek kaam aur kiyaa karataa hU.n janm din par koshish karataa hU.n, koI na koI ek nazm aap logo.n ke lie pesh kar sakU.n.. agar nIyat ho to sun lIjiye.. chaliye ek nazm..


"bha.nvar sI ghUmatI hai ye zamI.n, roko
bha.nvar sI ghUmatI hai ye zamI.n, roko
utar ke pUCh lU.n aakhir mujhe jaanaa kahaa~.n tak hai!
isI sTeshan pe le aatI hai ye har saal mujhako
aur rokatI bhI nahI.n hai
jahaa.n janm kI taarIkh. likhI hai

bha.nvar ke daayare gar phail rahe hai.n
to phir saahil kahaa~.n hai.n
simaTataa jaa rahaa hai daayaraa to phir
umra kaa marakaz kahaa~.n par hai

bha.nvar sI ghUmatI hai ye zamI.n, roko
utar ke pUCh lU.n aakhir mujhe jaanaa kahaa~.n tak hai"

bahut bahut shukriyaa!

गुरुवार, २७ अगस्त २००९

रीढ़ - Reedh - One of the most inspiring poems. Kusumagraj Translated by Gulzar

Translation of Kusumagraj's one of the most inspiring poems (Reedh - Original Title Kanaa in Marathi). Very Simply told but exceptional in impact.. Conversation of a student with his old time teacher after long time.. (for roman, scroll down)


रीढ़


"सर, मुझे पहचाना क्या?"
बारिश में कोई आ गया
कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुए

पल को बैठा, फिर हँसा, और बोला ऊपर देखकर

"गंगा मैया आई थीं, मेहमान होकर
कुटिया में रह कर गईं!
माइके आई हुई लड़की की मानिन्द
चारों दीवारों पर नाची
खाली हाथ अब जाती कैसे?
खैर से, पत्नी बची है
दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझा,
जो था, नहीं था, सब गया!

"’प्रसाद में पलकों के नीचे चार क़तरे रख गई है पानी के!
मेरी औरत और मैं, सर, लड़ रहे हैं
मिट्टी कीचड़ फेंक कर,
दीवार उठा कर आ रहा हूं!"

जेब की जानिब गया था हाथ, कि हँस कर उठा वो...

’न न’, न पैसे नहीं सर,
यूंही अकेला लग रहा था
घर तो टूटा, रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी...
हाथ रखिये पीठ पर और इतना कहिये कि लड़ो... बस!"

Reedh (Original Title Kanaa)
Original Marathi Poem : Kusumagraj
Translated by Gulzar


Reedh
:


"Sir, Mujhe Pehchaana kya?"
Baarish me koi aa gaya
kapade the muchade hue
aur baal sab bheege hue

pal ko baitha, phir hansaa aur bola oopar dekh kar

"gangaa maiyya aaI thi, mehmaan hokar
kutiyaa me rah ke gaI|
maaike aai huee ladaki ki maanind
chaaron deewaro par naachi
khaali haath ab jaato kaise?
khair se, patni bachi hai
deewaar chooraa ho gaI, chulha bujha
jo tha, nahin tha, sab gaya!


"prasaad me palako ke neeche chaar katare rakh gaI hai paani ke
meri aurat aur mai.n laD rahe hai
mitti keechad phenk kar
deewaar uthaa kar aa rahaa hoon!"

jeb ki jaanib gayaa tha haath, ki hans kar uthaa wo...

'na, na, na paise nahi.n sir,
yunhi akela lag rahaa tha..
ghar to TuTa, reedh ki haddi nahi.n TuTi meri
haath rakhiye peeth par, aur itna kahiye ki
laDo...bas!...

शुक्रवार, १७ अप्रैल २००९

चौपाल की नई तस्वीरें : Chaupal New Pics [Gulzar]

Chaupal Pics[New Set of Pics from Ashok ji's Camera]

मंगलवार, १४ अप्रैल २००९

चौपाल में गुलज़ार साब की ऑस्कर जीत का जश्न [Oscar Victory Celebrations at Chaupal]

रविवार 12 अप्रैल, स्थान-राजेन्द्र गुप्ता जी की बगीची, चौपाल फिर से जमी. मगर इस बार बहुत ही खास मक़सद के साथ. गुलज़ार साब की ऑस्कर जीत का जश्न मनाने और गुलज़ार साब को इस उपलब्धि के लिये सम्मानित करने के लिये. और जब गुलज़ार साब आमंत्रित हों तो चौपाली रसिकों का एक मक़सद अपने आप जुड़ जाता है, उनको जी भर के सुनने का । तो साहेबान महफ़िल जमी और क्या खूब जमी। मुम्बई की उमस भरी गर्मी को मात देते हुए पसीने से तरबतर 150 के ऊपर, चौपाली रसिक सुरों और कविताओं की बौछार से 5 घंटे तक सराबोर होते रहे।

महफ़िल की शुरुआत हुई गज़ल गायिका सीमा सहगल के गायन से जिन्होने गुलज़ार साब के शब्दों (यार जुलाहे) को धुन और आवाज़ में बांध कर प्रस्तुत किया। जावेद सिद्दिकी साब, अपनी बेटी लुबना, दामाद सलीम आरिफ़ और नातियों फ़राज़ और फ़ैज़ी(तहरीर में ईदगाह का हामिद) के साथ प्रस्तुत थे और तीनों पीढियों ने गुलज़ार साब को अपने अपने ढंग से प्रस्तुत किया.. जावेद साब ने गुलज़ार साब के बहुआयामी व्यक्तित्व के कुछ जाने और कुछ अनजाने पहलुओं का जिक्र किया। लुबना और सलीम की जोड़ी ने गुलज़ार साब द्वारा लिखित नाटक "खराशें" के कुछ अंश प्रस्तुत किये वहीं फ़ैज़ी ने बच्चों की कविता से बहुत तालियां बटोरी।

साहित्यकार विश्वनाथ सचदेव ने गुलज़ार साब के साथ बांटे गये मज़ेदार लम्हों की याद ताज़ा की । पूना से आये फ़िल्म इन्स्टीट्यूट FTII के निदेशक (धुनों की यात्रा के लेखक) पंकज राग ने अपनी किताब से कुछ अंश पढ़ कर सुनाये। किशोर कदम (सौमित्र) ने गुलज़ार साब की डायरी का काव्य पाठ किया तो शेखर सेन ने उनके कुछ फ़िल्मी गीत सुनाये । हास्य और व्यंग के एक वर्तमान हस्ताक्षर सुभाष काबरा ने अपने गुलज़ार साब पे केन्द्रित एक मज़ेदार व्यंग पाठ "हाय, हम गुलज़ार ना हुए" से चौपाल की सभा को एक नया माहौल दिया । फिर बारी थी स्टेज पे आने की भूपेन्द्र की और शुरुआत की उन्होने "थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा आसमां" के साथ और उनके गाते गाते शब्द भूलने का पुरुस्कार श्रोताओं को मिला एक अनूठी जुगलबन्दी के साथ, भुपेन्द्र और विशाल भारद्वाज के साथ... दर-असल भूपी जी को, विशाल श्रोताओं के बीच में से बार बार सही शब्द याद दिला रहे थे... गुलज़ार साब ने विशाल को स्टेज पे धकेल दिया और विशाल और भूपी जी ने "बादलों से काट काट कर" और "तेरे जाने से कुछ बदला नहीं" को जुगलबंदी में पेश कर सबका मज़ा दोगुना कर दिया।

इनके गायन के बाद वो पल आया, जिसके लिये ये महफ़िल सजाई गई। कार्यक्रम का संचालन कर रहे चौपाल के "एंकर" अतुल तिवारी ने गुलज़ार साब को सम्मानित करने के लिये मंच पे आमंत्रित किया पुष्पा भारती जी (स्व. धर्मवीर भारती की पत्नी) को । पुष्पा जी ने गुलज़ार साब को ट्रॉफ़ी प्रदान कर सम्मानित किया और चौपाल के इतिहास में एक यादगार पल की प्रविष्टी कर दी ।

अशोक बिन्दल (जिनको ट्रॉफ़ी की खूबसूरती का श्रेय भी जाना चाहिये) ने गुलज़ार साब को अपनी कविता "ठहरी हुई आवाज़" समर्पित की। ट्रॉफ़ी पर पवन की ऑस्कर जीत की एक त्रिवेणी अंकित थी, जिसको मंच पे पढ़ा गया।


"ये सोना जो इतना चमक रहा है
अपनी किस्मत पे इतरा रहा है शायद!

तेरे नूर के आगे फिर भी फीका है।"


चित्रकार चरण शर्मा ने गौतम बुद्ध पर बनाई एक विशेष पेंटिंग और उनकी पुस्तक गुलज़ार साब को प्रस्तुत की।

गुलज़ार साब ने चौपाल परिवार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि चौपाल उनका परिवार है और ऑस्कार से ज्यादा खुशी इस बात से है कि उनका चौपाल जैसा परिवार है ।

पुष्पा जी ने धर्मवीर भारती जी का गुलज़ार साब पे कई वर्षों पहले लिखा एक लेख पढ़ कर प्रस्तुत किया।

और बारी आई गुलज़ार साब के काव्य-पाठ की, और अगले एक घंटे तक अपनी नज़्मों की बौछार से गुलज़ार साब ने श्रोताओं को सराबोर कर दिया। एक के बाद एक नज़्मों की बौछार चली जिनमें "खुदा", "कितनी गिरहें", "पूरे का पूरा आकाश", "चिपचिपे दूध से नहलाते", और "सिद्दार्थ" शामिल थी।

बारिश थमी भी ना थी कि रेखा भारद्वाज, जिनके गायन की बहुत पब्लिक डिमांड थी, ने "इश्क़ा इश्क़ा" से "तेरे इश्क़ में" और "तेरी रज़ा" सुना कर श्चौपाल के रसिकों को वाह वाह कहने पे मज़बूर कर दिया। कार्यक्रम के अंत में प्रस्तुति दी अनिल-सीमा सहगल की बेटी पार्वती ने, जिसने गुलज़ार साब की नज़्म को अपनी धुन के साथ प्रस्तुत किया। 5 घंटे के बाद भी किसी की इच्छा नहीं थी कि ये यादगार शाम कभी खत्म हो।

कुछ तस्वीरें पेश हैं (अशोक बिन्दल, मोहित कटारिया, भीम सिंह, अंशुल चौबे और प्रेरक व्यास के सहयोग से) :

गुरुवार, २६ मार्च २००९

ऑस्कर पहुंचा बोस्किआना (Oscar Arrived at Boskyana)

गुलज़ार साब ऑस्कर समारोह में नहीं जा पाये मगर अब परम्परा के मुताबिक गुलज़ार साब की ऑस्कर ट्रॉफी सोमवार को उनके घर बोस्किआना पहुंच गई है ।

Picture Courtesy : Meghna Gulzar
[साभार : मेघना गुलज़ार - ऑस्कर के आगमन पर ये खूबसूरत तस्वीर बिटिया मेघना के द्वारा ली गई है । शुक्रिया मेघना! इस लम्हे को हम सब के साथ बांटने के लिये]


बोस्किआना में पहले ही ट्रॉफियों का इक भरा पूरा परिवार, अपने इस नवीनतम सदस्य के लिये जगह बनाने में लग गया है!

बुधवार, ११ मार्च २००९

होली के रंगों में एक रंग : Holi Mubaarak!

होली के रंगों में एक रंग और : गुलज़ार साब की एक त्रिवेणी जो आज के दैनिक भास्कर के होली विशेष में शामिल हुई है


ज़रा पैलेट सम्भालो रंगोबू का
मैं कैनवास आसमां का खोलता हूं

बनाओ फिर से सूरत आदमी की!


साथ में एक और रंग बोनस में.. ईद के चाँद पर होली का रंग!

जहां नुमा एक होटल है नां...
जहां नुमा के पीछे एक टी.वी. टॉवर है नां...
चाँद को उसके ऊपर चढ़ते देखा था कल!

होली का दिन था
मुंह पर सारे रंग लगे थे
थोड़ी देर में ऊपर चढ़ के
टांग पे टांग जमा के ऐसे बैठ गया था,
होली की खबरों में लोग उसे भी जैसे
अब टी.वी. पर देख रहे होंगे!!





Source : Dainik Bhaskar, March 10, 2009, Page 17 link

रविवार, ८ मार्च २००९

कितनी गिरहें खोली हैं मैने :[Gulzar saab's Poem on Women’s Day]

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर गुलज़ार साब की एक बेहद संवेदनशील रचना .. कितनी गिरहें खोली हैं मैने, कितनी गिरहें अब बाकी हैं.. ये रचना गुलज़ार साब ने सबसे पहले जयपुर में सुनाई थी.. और बाद में भुपेन्द्र-मिताली के साथ उनके एलबम "चाँद परोसा है" में मिताली की आवाज़ में प्रस्तुत हुई।


कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

पांव मे पायल, बाहों में कंगन, गले मे हन्सली,
कमरबन्द, छल्ले और बिछुए
नाक कान छिदवाये गये
और ज़ेवर ज़ेवर कहते कहते
रीत रिवाज़ की रस्सियों से मैं जकड़ी गयी

उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...

अब छिलने लगे हैं हाथ पांव,
और कितनी खराशें उभरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी रस्सियां उतरी हैं

कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी

उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...

मैं पूछूं ज़रा, मैं पूछूं ज़रा
आँखों में शराब दिखी सबको, आकाश नहीं देखा कोई
सावन भादौ तो दिखे मगर, क्या दर्द नहीं देखा कोई
क्या दर्द नहीं देखा कोई

फ़न की झीनी सी चादर में
बुत छीले गये उरियानि के
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी
मेरे जिस्म पे फ़न की मश्क़ हुई
और आर्ट-कला कहते कहते
संगमरमर मे जकड़ी गयी

उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी...

बतलाए कोई, बतलाए कोई
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

सोमवार, २३ फरवरी २००९

चख ले, हां चख ले, ये रात शहद है

"जय हो"

जीत का इससे बेहतर उदबोधन क्या होगा!

गुलज़ार साब की जीत, रहमान की जीत, गीत से जुड़े सभी लोगों की जीत, सभी सुनने वालॊं की जीत, हिन्दी फ़िल्म संगीत की जीत

हमें गर्व है गुलज़ार साब और रहमान पर..

आज गुलज़ार साब समारोह में नही थे, मगर ऑस्कर समारोह गुलज़ार हो गया!


जय हो!

बुधवार, २१ जनवरी २००९

जयपुर हुआ गुलज़ार II

जयपुर प्रवास के दूसरे दिन गुलज़ार साब सुनने वाले काव्य रसिकों से रूबरू हुए एक अनूठे आयोजन में.. श्री पवन के वर्मा के साथ काव्य - जुगलबन्दी प्रस्तुत करते हुए. मौका था जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल का एक सत्र, जहां गुलज़ार साब और श्री वर्मा ने गुलज़ार साब की नज़्मों और त्रिवेणियों को, मिलकर हिन्दोस्तानी और अंग्रेज़ी मे प्रस्तुत कर सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया. सुनने के लिये खचाखच भरे हाल के अन्दर जितने श्रोता थे, उससे ज्यादा बाहर मज़बूरन टी.वी स्क्रीन्स पे मौज़ूद थे..


जयपुर हुआ गुलज़ार

गुलज़ार साब इन दिनों जयपुर में हैं. अपनी जयपुर यात्रा के पहले दिन आज सुबह आबशार संस्था द्वारा आयोजित पोएट्री वर्कशाप में शिरकत की और नये नौजवान शायरों के कलाम सुने. शाम को अपनी नज़्मों की बौछार से जयपुर के काव्य रसिकों को सराबोर कर दिया.. कल जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल में गुलज़ार साब, श्री पवन वर्मा के साथ नज़्मों की जुगलबंदी पेश करेंगे और २२ तारीख को उनकी नयी किताब "यार जुलाहे" क विमोचन है. इन सभी ही कार्यक्रमॊ के बारे में विस्तार से समय मिलते ही लिखुंगा.. फ़िलहाल आज के कार्यक्रमों की कुछ तस्वीरें पेश हैं